जिस महिला डॉक्टर पर परिवार ने किया भरोसा, उसी ने दिया जिदंगी भर का दुख
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कैसे महिला डॉक्टर की एक छोटी सी लापरवाही पूरे परिवार को जिदंगी भर का दर्द दे गई। परिवार ने जिस पर भरोसा किया, वे ऐसा कर देंगी। परिवार अभी तक सदमें से उबर नहीं पा रहा है।
सैनिक कॉलोनी, कौलागढ़ निवासी कुमकुम पत्नी दुष्यंत कुमार के मुताबिक 22 अप्रैल, 2016 को उसने पुत्री को जन्म दिया था। यह बच्ची लाइलाज बीमारी डाउन सिंड्रोम से पीड़ित है। कुमकुम ने बताया कि गर्भावस्था के दौरान उसने बल्लूपुर रोड स्थित अर्चना हॉस्पिटल एंड लिथोट्रेप्सी सेंटर में चेकअप व इलाज कराया था।
तीसरे महीने में अस्पताल की डॉक्टर अर्चना लूथरा ने उसे ट्रिपल टेस्ट कराने को कहा। ट्रिपल टेस्ट रिपोर्ट आने के बाद उसने 30 नवंबर, 2016 को डॉक्टर को रिपोर्ट दिखाई। डॉक्टर ने रिपोर्ट देखने के बाद लो रिस्क लिख दिया, जबकि टेस्ट रिपोर्ट में हाई रिस्क लिखा था।
बच्ची के जन्म के बाद भी बात कुछ नहीं बाेले डॉक्टर
कुमकुम का कहना है कि गर्भावस्था के दौरान वह डॉक्टर अर्चना लूथरा से समय-समय पर परामर्श लेती रही। बच्ची के जन्म के बाद भी डॉक्टर ने डाउन सिंड्रोम होने की बात उनको नहीं बताई।
उन्होंने डाउन सिंड्रोम की आशंका जताई और डॉक्टर से इसकी जांच कराने को कहा। इस दौरान दंपति ने बच्ची के खून का सैंपल जांच के लिए भेज दिया। कुमकुम ने कहा कि डा. अर्चना लूथरा की ओर से करवाए ट्रिपल टेस्ट की रिपोर्ट डिलीवरी के बाद अन्य विशेषज्ञों को दिखाई तो पता चला कि उस रिपोर्ट में हाई रिस्क लिखा था, जो डाउन सिंड्रोम को दर्शाता है।
इस पर मामले की शिकायत सीएमओ से की तो जांच में प्राइवेट अस्पताल की डॉक्टर की लापरवाही सामने आई है। जांच टीम की रिपोर्ट में बताया गया है कि डा. अर्चना लूथरा की ओर से ट्रिपल टेस्ट रिपोर्ट का अवलोकन किया गया और अवलोकन के बाद भी महिला को गर्भावस्था जारी रखने को कहा, जबकि ट्रिपल टेस्ट रिपोर्ट में शिशु को डाउन सिंड्रोम के लिए हाई रिस्क दिखाया गया था।
जांच टीम ने कहा कि डा. अर्चना लूथरा ने ट्रिपल टेस्ट रिपोर्ट का गहनता से अध्ययन नहीं किया। डॉक्टर ने दंपति को डाउन सिंड्रोम (जो कि एक आनुवंशिक या क्रोमोसोम जनित विकास है) के बारे में नहीं बताया।
जानिए, क्या कहती हैं कि आरोपी चिकित्सक
इस मामले में सीएमओ द्वारा करवाई गई जांच में डॉक्टर की लापरवाही की पुष्टि हुई है। मामले की जांच दून अस्पताल के अपर मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ. संजीव दत्त, दून अस्पताल के पैथोलॉजिस्ट एनके मिश्रा व वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. अर्चना वर्मा ने की थी।
बता दें कि ट्रिपल टेस्ट गर्भावस्था के 15 हफ्ते के बाद कराया जाता है। इस टेस्ट में अगर हाई रिस्क आता है तो गर्भस्थ को डाउन सिंड्रोम की आशंका रहती है। इसकी पुष्टि के लिए एम्यूनिसिंटेेसिस टेस्ट होता है, जिसमें यह पुष्टि हो जाती है कि बच्चा नार्मल है या एबनार्मल।
आरोपी चिकित्सक डा. अर्चना लूथरा का कहना है कि ये आरोप गलत हैं। मुझे इन लोगों ने ट्रिपल टेस्ट की रिपोर्ट नहीं दिखाई। बच्चा होने के बाद मुझे रिपोर्ट दिखाई गई।