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रिटायरमेंट के बाद इन्होंने की समाज की नई नौकरी

Wed, 03 Dec 2014 03:25 PM IST
योगेंद्र सिंह, जोगेंद्र सिंह मावी/ हरिद्वार, अमर उजाला
योगेंद्र सिंह, जोगेंद्र सिंह मावी/ हरिद्वार, अमर उजाला Updated Wed, 03 Dec 2014 03:25 PM IST
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doing social job after retirement.

अपने लिए तो सभी जीते हैं, लेकिन दुनिया उसी को याद रखती है जो दूसरों के लिए जीते हैं। हरिद्वार के शिक्षक सतीश चौहान और महिला अस्पताल की नर्स इंद्रेश बाला ऐसे ही शख्स हैं जो रिटायरमेंट के बाद भी निस्वार्थ और नि:शुल्क तरीके से दूसरों की सेवा में लगे हैं।

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शिक्षकों को ही नहीं, सतीश चौहान से सभी को सीख लेनी चाहिए। उनकी जिंदगी का फलसफा है रिटायरमेंट तो कागजों पर होता है, असल नौकरी दूसरों की सेवा है। चौहान शिक्षक हैं तो नई पीढ़ी को गढ़ने का हुनर मालूम है। रिटायरमेंट के आठ माह बाद भी पूरे जोश और जुनून से राजकीय जूनियर हाई स्कूल रोशनाबाद के बच्चों को पढ़ाने का काम कर रहे हैं।
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चौहान का गांव बौंगला बहादराबाद उनके स्कूल से सात किलोमीटर की दूरी पर है। नियमित रूप से साइकिल चलाकर प्रतिदिन वहां से स्कूल आना और जाना होता है। कमाल यह है कि आधा घंटा पहले ही स्कूल पहुंच जाते हैं। सरकारी स्कूल अंग्रेजी की पढ़ाई में खासे पिछड़े हैं।
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ऐसे में अंग्रेजी पढ़ाने वाले चौहान का योगदान समझा जा सकता है। अपने शिष्यों का वह कितना ध्यान रखते हैं इसके बारे में स्कूल के प्रधानाचार्य संजय चौहान बताते हैं कि यदि कोई बच्चा दो दिन से ज्यादा गैरहाजिर रहता है तो सतीश जी उसके घर जाकर उसके अभिभावकों से उसकी वजह पूछते हैं। बच्चों की बेहतरी के लिए अभिभावकों को टिप्स भी देते रहते हैं।

स्कूल में 336 बच्चे पंजीकृत हैं पर शिक्षक दो ही हैं। मेरे रिटायरमेंट के बाद पढ़ाई प्रभावित होना लाजमी थी जो मुझे अच्छा नहीं लगा। इधर-उधर बैठने से मैं बच्चों को पढ़ाना ज्यादा उचित मानता हूं।
- सतीश चौहान, सेवानिवृत्त शिक्षक

काबिल-ए-तारीफ हैं इंद्रेश बाला

doing social job after retirement.

इंद्रेश बाला की जगह कोई और शख्स होता रिटायरमेंट के बाद दोचार दिन आराम तो जरूर करता मगर हरिद्वार के महिला अस्पताल की यह नर्स रिटायरमेंट के अगले दिन ही काम करने आ गईं। बताया कि वह निशुल्क मरीजों की तीमारदारी करना चाहती हैं। पूरे स्टाफ ने तालियों की गड़गड़ाहट के साथ उनके जज्बे को सराहा।

हरिद्वार महिला अस्पताल की नर्स इंद्रेश बाला ठाकुर मूल रूप से देहरादून के बद्रीपुर की निवासी हैं। 30 नवंबर को ही 32 साल की नौकरी के बाद रिटायर्ड हुईं। आखिरी दिन समस्त स्टाफ ने उन्हें नम आंखों से विदाई दी। एक दिसंबर (सोमवार) को वह घर पर रहीं।

दो दिसंबर को इंद्रेश अस्पताल पहुंच गईं और सीएमएस डॉ. भवानी पाल से मरीजों की निशुल्क सेवा की पेशकश की। सीएमएस ने भी उनका आग्रह मान लिया। सीएमएस डॉ. भवानी पाल ने बताती हैं कि इंद्रेश हमेशा अपने सेवाभाव से दूसरों को प्रेरणा देती रही हैं।

कई बार वह गरीब मरीजों को अपने पैसे से दवाइयों और दूसरी चीजों की मदद भी करती हैं। यही वजह है कई मरीज ठीक होने के बाद भी उनसे मिलने आते हैं।

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