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बांड भरकर भी डॉक्टर साहब नहीं चढ़ रहे पहाड़
रविंद्र थलवाल/अमर उजाला, उत्तरकाशी
Updated Wed, 02 Apr 2014 09:44 PM IST
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पांच साल तक पहाड़ में सेवा देने का बांड भरकर सरकारी मेडिकल कॉलेजों से कम खर्चे पर बने डॉक्टरों को भी पहाड़ की नौकरी रास नहीं आ रही है।
ऐसे में जब तक डॉक्टरों को पहाड़ चढ़ाने के लिए ठोस नीति नहीं बन जाती है तब तक पहाड़ की स्वास्थ्य सेवा में सुधार की कल्पना नहीं की जा सकती है।
पांच साल का होता है अनुबंध
सरकार श्रीनगर और हल्द्वानी मेडिकल कालेज में 15 हजार रुपये सालाना फीस लेकर युवाओं को डॉक्टर बना रही है। इन डॉक्टरों के साथ पांच साल तक पहाड़ पर सेवा देने का अनुबंध होता है, लेकिन डॉक्टर अनुबंध का पालन नहीं कर रहे हैं।
उत्तरकाशी जनपद में स्वास्थ्य महकमा मार्च 2013 से अब तक 22 संविदा डॉक्टरों के नियुक्ति के आदेश कर चुका है। 22 डॉक्टरों में से 8 ने ही कार्यभार संभाला, जिसमें से चार डॉक्टर लंबे समय से बिना पूर्व सूचना दिए गायब हैं।
डॉक्टर कहां चले गए इस बारे में जिले के स्वास्थ्य महकमे को जानकारी नहीं है। जिले के स्वास्थ्य महकमे ने इनकी गुमशुदगी तक दर्ज नहीं कराई।
ऐसे में उत्तराखंड सरकार सरकारी मेडिकल कालेजों के छात्र-छात्राओं को फीस में छूट देकर उन्हें डॉक्टर तो बना रही है, लेकिन जब तक डॉक्टरों को पहाड़ में टिकाने के लिए ठोस नीति नहीं बन जाती है तब तक पहाड़ की बदतर होती स्वास्थ्य सेवा में सुधार की कल्पना नहीं की जा सकती है।
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नानबांडेड डॉक्टर भी नहीं पहुंचे
स्वास्थ्य महकने मार्च 2013 से मार्च 2014 तक 16 नानबांडेड चिकित्सकों के भी उत्तरकाशी में नियुक्ति के आदेश किए थे, लेकिन इसमें मात्र तीन डॉक्टरों ने ही कार्यभार संभाला, जिसमें एक ने तो त्याग पत्र दे दिया। जबकि शेष 13 डॉक्टर तो यहां देखने तक नहीं आए।
ये हैं जिले के चिकित्सक विहीन अस्पताल
अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बनचौरा, दिचली, ऐलोपैथिक चिकित्सालय गंगनानी, कल्याणी, दिचली, राजगढ़ी, कुमोला, गुंदियाटगांव, टिकोची, गंगाड़, लिवाड़ी, नैटवाड़ आदि।
इन अस्पतालों के डॉक्टर हैं गायब
महिला चिकित्सालय भटवाड़ी, राजकीय एलोपैथिक अस्पताल कल्याणी, अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र धौंतरी, बनचौरा एवं डामटा।
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ऐसे में जब तक डॉक्टरों को पहाड़ चढ़ाने के लिए ठोस नीति नहीं बन जाती है तब तक पहाड़ की स्वास्थ्य सेवा में सुधार की कल्पना नहीं की जा सकती है।
पांच साल का होता है अनुबंध
सरकार श्रीनगर और हल्द्वानी मेडिकल कालेज में 15 हजार रुपये सालाना फीस लेकर युवाओं को डॉक्टर बना रही है। इन डॉक्टरों के साथ पांच साल तक पहाड़ पर सेवा देने का अनुबंध होता है, लेकिन डॉक्टर अनुबंध का पालन नहीं कर रहे हैं।
उत्तरकाशी जनपद में स्वास्थ्य महकमा मार्च 2013 से अब तक 22 संविदा डॉक्टरों के नियुक्ति के आदेश कर चुका है। 22 डॉक्टरों में से 8 ने ही कार्यभार संभाला, जिसमें से चार डॉक्टर लंबे समय से बिना पूर्व सूचना दिए गायब हैं।
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डॉक्टर कहां चले गए इस बारे में जिले के स्वास्थ्य महकमे को जानकारी नहीं है। जिले के स्वास्थ्य महकमे ने इनकी गुमशुदगी तक दर्ज नहीं कराई।
ऐसे में उत्तराखंड सरकार सरकारी मेडिकल कालेजों के छात्र-छात्राओं को फीस में छूट देकर उन्हें डॉक्टर तो बना रही है, लेकिन जब तक डॉक्टरों को पहाड़ में टिकाने के लिए ठोस नीति नहीं बन जाती है तब तक पहाड़ की बदतर होती स्वास्थ्य सेवा में सुधार की कल्पना नहीं की जा सकती है।
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नानबांडेड डॉक्टर भी नहीं पहुंचे
स्वास्थ्य महकने मार्च 2013 से मार्च 2014 तक 16 नानबांडेड चिकित्सकों के भी उत्तरकाशी में नियुक्ति के आदेश किए थे, लेकिन इसमें मात्र तीन डॉक्टरों ने ही कार्यभार संभाला, जिसमें एक ने तो त्याग पत्र दे दिया। जबकि शेष 13 डॉक्टर तो यहां देखने तक नहीं आए।
ये हैं जिले के चिकित्सक विहीन अस्पताल
अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बनचौरा, दिचली, ऐलोपैथिक चिकित्सालय गंगनानी, कल्याणी, दिचली, राजगढ़ी, कुमोला, गुंदियाटगांव, टिकोची, गंगाड़, लिवाड़ी, नैटवाड़ आदि।
इन अस्पतालों के डॉक्टर हैं गायब
महिला चिकित्सालय भटवाड़ी, राजकीय एलोपैथिक अस्पताल कल्याणी, अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र धौंतरी, बनचौरा एवं डामटा।