उत्तराखंड के 'फील्ड मार्शल' ने बताई यूकेडी के इस हाल की वजह
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उत्तराखंड राज्य आंदोलन के जो लोग गवाह रहे हैं, वे जानते हैं कि दिवाकर भट्ट किस शख्सियत का नाम है। उम्र के उत्तरार्द्ध में भट्ट भले ही क्षेत्रीय सरोकारों की सियासत से भटक चुके हों, मगर जब-जब क्षेत्रीय राजनीति और राज्य आंदोलन के इतिहास के पन्ने खुलेंगे, इस फील्ड मार्शल की संघर्ष गाथाएं उसमें दर्ज मिलेंगी।
देश के कई राज्यों में जहां क्षेत्रीय राजनीति का प्रयोग कामयाब रहा, मगर भट्ट को नहीं लगता कि उत्तराखंड की सियासी जमीन क्षेत्रीय ताकतों के लिए उतनी उर्वरा रह गई है। इसलिए भट्ट ने भाजपा का दामन थाम लिया और वे भगवा रंग में इस कदर रंग गए कि अब उन्हें सिर्फ पीएम नरेंद्र मोदी पर ही भरोसा है।
वे कहते हैं, ‘मैं व्यथित हूं कि 16 साल बाद भी उत्तराखंड शहीदों और आंदोलनकारियों के सपनों का राज्य नहीं बन सका। अब मोदी का विराट विजन ही इन सपनों को साकार करेगा।’ यूकेडी के बिखराव के लिए वे कुछ नेताओं के व्यक्तिगत अहम और स्वार्थों को जिम्मेदार ठहराते हैं। लेकिन राज्य आंदोलन के उनके साथी रहे पूर्व विधायक काशी सिंह ऐरी को वे ज्यादा गुनाहगार मानते हैं। कहते हैं कि ऐरी ने ही यूकेडी की लुटिया डुबोई। अमर उजाला संवाददाता राजेश शर्मा ने कभी उत्तराखंड राज्य आंदोलन के नायक रहे भट्ट से ज्वलंत विषयों पर दो टूक बातचीत की। आप भी पढ़िए, वे क्या बोले-
16 साल बाद कहां उत्तराखंड?
सवाल- गठन के 16 साल बाद उत्तराखंड को लोगों की भावनाओं के अनुरूप कहां पाते हैं?
जवाब- उत्तराखंड राज्य का गठन लंबे संघर्ष और आंदोलनकारियों की शहादत के बाद हुआ। दु:ख की बात यह है कि पलायन जैसी जिस विपदा को रोकने के लिए उत्तराखंड राज्य का गठन किया गया था। यह समस्या अलग राज्य बनने के बाद और भी ज्यादा बढ़ती जा रही है। आंदोलनकारियों और शहीदों के सपनों का उत्तराखंड बनाने में हम नाकाम रहे हैं।
सवाल- मुद्दों से भटकाव की वजह क्या रही?
जवाब-पलायन सबसे बड़ा मुद्दा था। जरुरत इस बात की थी कि 21वीं सदी जैसी सुविधाएं पहाड़ के अति पिछड़े इलाकों में उपलब्ध कराई जाती और इन सुविधाओं को भोगने के लिए संसाधन भी जुटाए जाते, लेकिन समय के साथ समस्याएं अपना रूप बदलती रहीं, उनके निराकरण के साथ सरकारें और सिस्टम कदम से कदम नहीं मिला सके।
ऐरी ने किया उक्रांद का सर्वनाश
सवाल- यूकेडी की फजीहत के लिए काशी सिंह ऐरी ने आपको जिम्मेदार ठहराया है?
जवाब- देखिए, अब मैं उत्तराखंड क्रांति दल और उसके नेताओं के बारे में कोई बात नहीं करना चाहता, लेकिन जिस तरह के आरोप काशी सिंह ऐरी ने मुझ पर लगाए हैं, तो इस बारे में मुझे भी कुछ कहना है। दल लोगों की भावनाओं से उपजा हुआ संगठन था जो राज्य गठन का माध्यम तो बन गया, लेकिन राजनैतिक संगठन का रूप शायद नहीं ले सका।
ऐरी का तो इस संगठन के गठन से कोई सरोकार नहीं है, बल्कि संगठन जब भी मजबूत होता गया, तो उन्होंने उसे खत्म करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्ष 1995 में जब राष्ट्रीय अधिवेशन गैरसैंण में हो रहा था तब वे उसे पहले कालागढ़ और फिर अल्मोड़ा ले गए, क्योंकि उस समय वे दिवाकर भट्ट की बढ़ती लोकप्रियता से बौखला गए थे।
वर्ष 1994 में हुए पौड़ी आंदोलन के अलावा श्रीयंत्र टापू और खैट पर्वत के आंदोलन जो राज्य गठन के लिए निर्णायक साबित हुए, वे भी मेरी ही जिद पर शुरू किए गए थे। इन सबके प्रमाण उपलब्ध हैं। काशी सिंह ऐरी को अपने गिरेबां में झांक कर देखना चाहिए कि वे आंदोलन के समय कहां थे? इसके बाद वर्ष 2002 में मैंने आंदोलनकारियों के मुकदमे वापसी के लिए जेल में 32 दिन भूख हड़ताल की तो त्रिवेंद्र पंवार से मिलकर उन्होंने मुझे दल से निकलवा दिया। उत्तराखंड क्रांति दल का सर्वनाश करने में सबसे ज्यादा दोषी काशी सिंह ऐरी ही हैं।
पीएम मोदी का विजन देख भाजपा के साथ
सवाल- भाजपा और कांग्रेस को कोसते-कोसते आपने यूकेडी जैसा क्षेत्रीय दल बनाया था और अब आप भाजपा की ही गोद में जाकर बैठ गए?
जवाब- दरअसल, उत्तराखंड क्रांति दल नेताओं के आपसी अहम के चलते ऐसी ताकत नहीं बन सका, जो राज्य गठन को लेकर यहां के लोगों की आकांक्षाओं को पूरी करता। मैंने तो उत्तराखंड क्रांति दल को बनाने से लेकर चलाने तक सबसे ज्यादा संघर्ष किया। जब सभी नेता अपना-अपना राग अलाप रहे थे तब 2012 में भाजपा के सिंबल पर चुनाव भी इसलिए लड़ा, ताकि उक्रांद का अस्तित्व बचा रहे। लेकिन लोगों ने दल को नकार दिया। अब मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2014 में पर्वतीय राज्यों के लिए अलग से कार्ययोजना बनाने की बात कही है। उससे लोगों की भावनाओं का उत्तराखंड बनाने में सफलता मिलेगी। इसी सोच से प्रभावित होकर मैंने भारतीय जनता पार्टी का दामन थामा।
सवाल- क्या यूकेडी के एजेंडे को भाजपा के चुनावी घोषणा पत्र में शामिल कराएंगे?
जवाब- इसकी शायद जरूरत ही नहीं पड़ेगी। क्योंकि प्रधानमंत्री ने अपने विजन में पहाड़ी राज्यों के विकास को शामिल करके पहले ही इन मुद्दों को अपनी कार्ययोजना में शामिल कर लिया है।
सवाल- अगर यूकेडी को दोबारा एकजुट करने का प्रयास किया जाता है तो क्या आप इसमें सहयोग करेंगे?
जवाब- मुझे नहीं लगता कि अब इसकी कोई जरूरत रह गई और शायद यह हो भी पाए। क्योंकि यूकेडी के नेता अब वैचारिक रूप से एक-दूसरे से बहुत दूर चले गए हैं। उनकी जिद और हठधर्मिता के चलते यह दल अब जनता का विश्वास भी खो चुका है। मैंने तो कईं बार यूकेडी को एकजुट करने की कोशिश की, लेकिन दूसरे नेताओं ने ही हर बार प्रयासों को पलीता लगाया।
सवाल- मंत्री के रूप में आपसे बहुत आशाएं थीं, आपसे पहाड़ की भावनाओं के लिए मंत्री के रूप में क्या किया?
जवाब- मंत्री के रूप में मैंने पहाड़ की मूलभूत समस्याओं को उठाया। खासतौर पर जल, जंगल और जमीन के मुद्दों का निराकरण कराने का प्रयास किया। हम जमीनें बचाने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री भुवनचंद्र खंडूरी के नेतृत्व में भू-कानून लाए। पानी का सदुपयोग करने के लिए अधिक से अधिक बिजली बनाने की योजना पर काम किया और बड़े बांधाें का विरोध करते हुए छोटे बांधों को बनवाने के लिए भी प्रयास किया। जंगलों को बचाने के लिए संशोधन अधिनियम लाकर जनता को सुविधाएं दिलाने का भरसक प्रयास किया। पूरे पहाड़ी क्षेत्र को उद्योगों से जोड़ने का महत्वपूर्ण निर्णय तत्कालीन कैबिनेट ने लिया था, ताकि पलायन को रोका जा सके। लेकिन इसके लिए तत्कालीन केंद्र सरकार ने कोई मदद नहीं की। अगर सरकार मदद करती तो इस दिशा में काफी काम हो सकता था।