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फसलों की बीमारियों से किसान हुए 'बीमार'
अमर उजाला, सेलाकुई
Updated Fri, 29 Nov 2013 01:01 PM IST
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पहले मौसम की मार और अब कीटों और बीमारियों का कहर, देहरादून में मटर की फसल पूरी तरह चौपट हो गई है। आलम यह है कि उत्पादन पिछले वर्षों के मुकाबले चार गुना तक घट गया है।
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लागत निकालना भी मुश्किल
ऐसे में किसानों के सामने मुनाफा तो दूर, लागत निकालना भी मुश्किल हो गया है। सहसपुर विकासखंड में 474 हेक्टेयर जमीन पर मटर की खेती होती है। इस बार ज्यादा बारिश होने से जमीन में नमी बनी रही, जिससे फसल पनप नहीं सकी।
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रही सही कसर फसल पर लगी बीमारी ने पूरी कर दी। सरकारी आंकड़े ही बताते हैं कि इस बार मटर की 40 फीसदी फसल नष्ट हो चुकी है। पहले प्रति हेक्टेअर 12 क्विंटल उत्पादन होता था जो अब तीन क्विंटल पर सिमट गया है। इससे काश्तकार परेशान हैं।
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सबसे ज्यादा दिक्कत उन मजदूरों को है, जिन्होंने खेत बटाई पर लिए थे। उन्हें प्रति हेक्टेअर 1000 रुपए चुकाने हैं, लेकिन फसल खराब होने से यह रकम जुटाना भी मुश्किल हो गया है।
कब होती है बुआई
पछवादून क्षेत्र में मानसून खत्म होने के बाद 15 सितंबर से मटर की बुआई शुरू होती है। 70 दिन में फसल चक्र पूरा होता है। लेकिन इस बार मानसून सितंबर अंत तक बने रहने से 70 दिन बाद भी फसल ठीक से अंकुरित नहीं हो सकी।
यहां होती है बुआई
सहसपुर, शंकरपुर, रामपुर, खुशहालपुर, लांघा रोड, ढाकी, रेड़ापुर, हुकुमतपुर, सेलाकुई, भाऊवाला, तेलपुरा, तिलवाड़ी, होरावाला, नया गांव, मांडूवाला, सुद्धोवाला, झाजरा, बंशीवाला आदि इलाकों में मटर की बुआई की जाती है।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
इस साल मटर के कम उत्पादन का कारण मौसम में आया बदलाव है। लंबे समय तक मानसून के बने रहने के कारण
वातावरण में खासा नमी बनी रही। जिस कारण फसल ठीक से अंकुरित नहीं हो सकी।
- सत्यप्रकाश नेगी, उद्यान प्रभारी सहसपुर
किसानों का दर्द
इस साल 125 बीघा भूमि किराये पर लेकर मटर की खेती की थी। लेकिन उत्पादन एक चौथाई रह गया है। लगता है इस साल किराया तक निकालना मुश्किल हो जाएगा।
- इस्तकार अली, किसान
प्रति हेक्टेअर बीज की खरीदारी से लेकर खाद और बुआई तक कुल मिलाकर खर्चा 25000 रुपये तक आ जाता है। लेकिन इस बार यह खर्चा भी निकल जाए तो बहुत होगा।
- तासीन, किसान
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