उत्तराखंड के पहाड़ों को आपदा से बचा सकता है ‘आपदा वॉचर’
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मानसून के दौरान पहाड़ों पर बाढ़ और भूस्खलन से आपदा के वक्त बचाव कार्य के लिए आगे आने वाले स्थानीय लोगों को ‘आपदा वॉचर’ बनाने की जरूरत है।
ऐसे लोग जो किसी दुर्घटना के समय सबसे पहले पहुंचकर बचाव करते हैं उन्हें मानदेय दिए जाने की भी व्यवस्था की जा सकती है। ऐसा प्रावधान राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम में भी है। अधिनियम के ऐसे ही बहुत से प्रावधानों के क्रियान्वयन के संबंध में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए याचिका दाखिल की गई है।
आपदा आने पर एसडीआरएफ, एनडीआरएफ और दूसरे विभागों की टीमें घटनास्थल पर देर से पहुंच पाती हैं। अब तक हुईं भूस्खलन, बाढ़ और सड़क दुर्घटना में सबसे पहले आसपास गांव के लोग मौके पर पहुंचकर बचाव कार्य में जुटते पाए गए।
ऐसे बचाव कार्यों में अग्रणी भूमिका निभाने वालों को और प्रोत्साहित करने के लिए मानदेय की व्यवस्था की जा सकती है। बारिश के मौसम भर ऐसे लोगों की टीमें बनाई जा सकती हैं। राज्य सरकार को ऐसा प्रावधान करने के लिए अधिनियम में भी व्यवस्था की गई है।
यही नहीं जंगलों की आग के दौरान शासन ऐसा प्रावधान कर चुका है। वन विभाग ने 9000 ग्रामीणों को फायर वॉचर बनाया था। इन्हें 235 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से मानदेय की व्यवस्था की गई। जब तक इनसे काम लिया गया, मानदेय दिया गया। आग बुझने पर इन्हें कार्यमुक्त कर दिया गया। शासन ऐसी ही व्यवस्था आपदा के मामले में भी कर सकता है।
अतिसंवेदनशील क्षेत्रों में दी जा सकती है लोगों को जिम्मेदारी
आपदा के मामले में अतिसंवेदनशील क्षेत्रों में लोगों को जिम्मेदारी दी जा सकती है। अधिनियम के ऐसे ही प्रावधानों को जमीनी हकीकत के लिहाज से अमल में लाए जाने के संबंध में वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव कुमार बंसल की ओर से सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए याचिका दाखिल की गई है।
भौगोलिक परिस्थिति की मांग
उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य की भौगोलिक परिस्थितियां इस व्यवस्था की मांग करती हैं कि आपदा प्रबंधन में स्थानीय नागरिकों की सहभागिता सुनिश्चित की जाए। अक्सर देखने में आता है कि आपदा या दुर्घटना में कठिन भौगोलिक क्षेत्र की वजह से सरकारी राहत दल काफी देर में पहुंच पाते हैं।
मौसम खराब हो तो हेलीकॉप्टर का उड़ना मुमकिन ही नहीं होता। इसके विपरीत दुर्घटना हो या आपदा किसी भी घटना पर नजर डाले, सबसे पहले घटनास्थल पर आस-पास इलाकों के ग्रामीण पहुंचते हैं और जिस भांति भी संभव हो वे पीड़ितों की मदद करते हैं। ग्रामीणों के इसी जज्बे को बस चैनलाइज और प्रोत्साहित करने की जरूरत है।
डिजिटल वॉलिंटियर्स की रणनीति
वर्ष 2013 की आपदा के बाद वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान में आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री हरीश रावत के समक्ष यूसैक ने डिजिटल वॉलिंटियर्स बनाए जाने की रणनीति पर चर्चा की थी। इन्हें यूसैक के नेटवर्क से जोड़ा जाना था।
यह कहा गया था कि कहीं भी अतिवृष्टि, बाढ़, भूस्खलन की स्थिति होने पर क्षेत्रीय वॉलिंटियर्स व्हॉट्सएप, एसएमएस से घटना की सूचना भेजेंगे जिससे बचाव कार्य जल्दी से जल्दी शुरू हो सके, लेकिन नेटवर्क अभी अधूरा है। यूसैक के निदेशक डा. दुर्गेश पंत ने बताया कि कें द्र और यूसैक तकनीकी कालेजों, विश्वविद्यालयों के कोर्स में यह ‘कंपोनेंट’ लाने की व्यवस्था कर रहा है।
ग्राम प्रहरी की व्यवस्था फेल
आपदा, जंगल की आग या किसी दुर्घटना की सूचना देने के लिए तैनात किए गए ग्राम प्रहरी की व्यवस्था फेल हो गई है। राजस्व विभाग ने पटवारियों से ग्राम प्रहरियों को अटैच कर दिया था। ये गांववालों और पटवारी के बीच कड़ी के रूप में तैनात किए गए, लेकिन आपदा की सूचना देने में इनका नेटवर्क बेअसर रहा।