आसमानी आफत के आगे बौना पड़ा प्रबंधन, खुली दावों की पोल
- दो जिलों में हुई बारिश ने खोली आपदा राहत कार्यों की कलई
- जून 2013 की आपदा के तीन साल बाद भी खतरे की पूर्व चेतावनी का तंत्र विकसित नहीं
- खतरे की जद में प्रदेश भर के 400 से अधिक गांव, लाखों लोगों की जिंदगी पर संकट
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आखिरकार वही हुआ, जिसका डर था। आसमान से आफत बरसी और इधर, सरकार व आपदा प्रबधंन विभाग के सुरक्षा इंतजामों की कलई खुल गई। मूसलाधार बारिश के चलते जनहानि के साथ संपत्ति का भी भारी नुकसान हुआ है। पिछले कई माह से आपदा राहत कार्यों को बेहद चुस्त दुरुस्त बताने वाली सरकारी मशीनरी भी राज्य में आई आपदा के सामने असहाय नजर आई। साफ हो गया कि जून 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद सरकार और आपदा प्रबंधन विभाग के अफसर आपदा राहत कार्यों को लेकर कुछ खास नहीं कर पाए हैं।
जून 2013 की केदारनाथ आपदा के तीन साल बाद यह संकट कम होने की जगह साल दर साल गहराता ही जा रहा है। भूकंप से लेकर बादल फटने, नदियों में अचानक बाढ़ आ जाने या फिर भूस्खलन से होने वाली तबाही के खतरे साल दर साल बढ़े ही हैं। लेकिन जिस गति से आपदा का खतरा बढ़ा है, उस गति से प्रबंधन तंत्र विकसित नही हो पाया।
सरकार और आपदा प्रबंधन विभाग अभी भी परंपरागत तरीके से ही चल रहा है। हाल यह है कि सरकार और आपदा प्रबधंन के अफसरों की तैयारी आपदा के बाद राहत और बचाव कार्यों पर ही केंद्रित है। लेकिन उसमें भी तमाम खामियां हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि मौसम विभाग की चेतावनी के बावजूद आपदा के लिहाज से संवेदनशील इलाकों में आपदा राहत कार्यों को लेकर कोई ठोस इंतजाम नहीं किए गए।
आपदा को लेकर सरकार कितनी सजग है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सरकार की ओर से स्थापित किए जाने वाले 64 ऑटोमेटिक वेदर स्टेशनों में से केवल चार ही स्थापित हो पाए हैं। डाप्लर रडार के जरिये मौसम की सटीक भविष्यवाणी भी हकीकत में नहीं बदल पाई।
आपदा ने ढाया कहर तो प्राधिकरण का गठन पर रह गई कमी
दिलचस्प पहलू यह है कि आपदा प्रबंधन से संबंधित नीतिगत फैसलों के लिए जरूरी जिस राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का गठन बहुत पहले कर लिया जाना चाहिए था, उसकी मंजूरी भी सरकार ने चार दिन पहले हुई कैबिनेट में दी है। प्राधिकरण का विधिवत गठन कर इसकी पहली बैठक मार्च में होनी थी। इसमें आपदा राहत से जुड़े तमाम अहम फैसले लिए जाने थे। पूरा तंत्र विकसित किया जाना था। लेकिन प्राधिकरण की बैठक और फैसले लेना तो दूर सरकार प्राधिकरण का गठन तक नहीं कर पाई।
खतरनाक ग्लेशियरों, झीलों पर भी नहीं पैनी नजर
सरकार ने जून 2006 में डॉ. बीआर अरोड़ा की अध्यक्षता में ग्लेशियरों के पिघलने से होने वाले नुकसान का आकलन करने के लिए समिति का गठन किया गया था। डॉ. अरोरा समिति की रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में गंगा बेसिन में 917, यमुना बेसिन में 50, भागीरथी बेसिन में 277, अलकनंदा बेसिन में 326 और कालीगंगा में 264 छोटे बड़े ग्लेश्यिर हैं।
प्रदेश में करीब 75 वर्ग किलोमीटर की 127 ग्लेशियर झीलें हैं। समिति ने ग्लेशियर झीलों के प्रभावित क्षेत्रों में पर्यटकों की आवाजाही सीमित करने, झीलों की सूची बनाने, मौसम पर ऑटोमेटिक वेदर स्टेशन के नेटवर्क के जरिए नजर रखने आदि की संस्तुति की थी। लेकिन सरकार ने इस रिपोर्ट को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया।
2013 केदारनाथ आपदा के बाद उठाए गए कुछ महत्वपूर्ण कदम
स्टेट डिजास्टर रिलीफ फोर्स (एसडीआरएफ) की तीन कंपनियां स्थापित की गईं।
दो और कंपनियों के गठन को सरकार की मंजूरी।
एसडीआरएफ को नए उपकरण खरीदने के लिए सरकार की ओर से आठ करोड़ रुपये जारी किए गए।
प्रदेश में चारधाम यात्रा पर आने वाले यात्रियों के बायोमेट्रिक पंजीकरण की व्यवस्था की गई।
52 नए हैलीपैड के निर्माण को सरकार ने मंजूरी दी। जिसमें से नौ बनकर तैयार हो गए। बाकी का निर्माण जारी।
रुद्रप्रयाग , चमोली और पिथौरागढ़ में आपदा से पहले भी जिला स्तरीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण गठित था। आपदा के बाद इन जिलों में योजना प्रबंधन इकाइयों (पीआइयू) का गठन भी किया गया।
सरकार की ओर से पीआईयू को पांच करोड़ रुपये तक के काम कराने की छूट भी दी गई।
केदारनाथ आपदा के बाद पहली बार सरकार की ओर से सेटेलाइट फोन की व्यवस्था की गई।
राष्ट्रीय आपदा मोचन बल ( एनडीआरएफ ) की एक कंपनी झाझरा में स्थापित।
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीआरएफ) के साथ आपदा प्रभावित क्षेत्रों में लोगों को आपदा प्रबंधन के प्रशिक्षण के लिए करार।
नदियों की स्थिति, बाढ़ क्षेत्र आदि के मापन के लिए भी योजना तैयार
आपदा राहत से जुड़े महत्वपूर्ण कार्य जो सरकार नहीं करा पाई
आपदा के लिहाज से संवेदनशील गांवों को चिन्हित कर अतिसंवेदनशील गांवों के ग्रामीणों को विस्थापित किया जाना था। पूर्व में कराए गए सर्वे में 321 ऐसे गांवों को चिन्हित भी किया गया। कुछ गांवों को विस्थापित करने की योजना भी बनी। लेकिन धरातल पर नहीं उतर पाई। अब सरकार माइनिंग विभाग की मदद से नए सिरे से सर्वे करा रही है। विभागीय टीम ने 79 ऐसे गांवों को चिन्हित भी किया है। लेकिन विस्थापन का काम अभी तक नहीं हो पाया है। ऐसे में इन गांवों के हजारों ग्रामीणों पर खतरा इस बार भी मंडराता रहेगा।
ग्लेशियर टूटने के कारण नदियों में अचानक आने वाली बाढ़ की पूर्व जानकारी के लिए ‘अर्ली वार्निंग सिस्टम’ की जरूरत 2013 में महसूस की गई। इसमें सिर्फ इतना ही काम हुआ कि चार स्थानों पर ‘ऑटोमेटिक वेदर स्टेशन’ स्थापित किए जा सके। जबकि प्रदेश में 64 स्थानों पर ये स्टेशन स्थापित किए जाने हैं। मौसम की सटीक जानकारी के लिए दो जगहों पर डॉप्लर रडार स्थापित करने की योजना का भी अता पता नहीं है।
जून 2013 की आपदा से यह भी सामने आया था कि आपदा प्रबंधन में प्रभावित लोगों की अधिक से अधिक भागीदारी होनी चाहिए। इसके लिए गांव के स्तर पर आपदा प्रबंधन योजना बनाने और उसे क्रियान्वित करने का लक्ष्य रखा गया था। यह काम पूरा नहीं हो पाया।
2013 की आपदा के बाद नदियों के बहाव क्षेत्र से बस्तियों को हटाने और भूकंपरोधी भवनों के निर्माण पर जोर दिया गया था। लेकिन यह काम भी अधर में लटका है।
यह है बड़ी चुनौतियां और आपदा से सुरक्षा के तरीके
प्रदेश में भूस्खलन, भारी बरसात या फिर बादल फटने से नदियों में अचानक बाढ़, भूकंप आदि की आपदा से निपटने की चुनौती है। पिछले कई साल से लगातार आ रही आपदा के चलते सैकड़ों पुल और हजारों किमीमीटर सड़क को नुकसान पहुंचा है। जिन्हें दुरुस्त करने में सरकार को अरबों रुपये खर्च करने पड़े। मौसम विभाग इस बार भी भारी बारिश की संभावना जता रहा है। ऐसे में भारी तबाही होना तय माना जा रहा है। आपदा की स्थिति में फंसे लोगों को सुरक्षित बाहर निकालना, उन्हें समय रहते राहत सामग्री पहुंचाना सरकार के सामने बड़ी चुनौती है।
आपदा से सुरक्षा के तरीके
-मीडिया, रेडियो के जरिए और मौसम विभाग की वेबसाइट पर जाकर मौसम की जानकारी लेते रहे।
-यदि आपके क्षेत्र में लगातार मूसलाधार बारिश हो रही हो तो जलभराव पर नजर रखें।
-यदि आपका मकान कच्चा है तो मूसलाधार बारिश के दौरान स्थिति पर लगातार निगरानी करते रहें।
-आवश्यक सामग्री जैसे टार्च, कुछ खाने-पीने का सामान, मोबाइल फोन, बैटरी आदि संभालकर अपने पास रखें।
-अपने जरूरी कागजात प्लास्टिक कवर में सुरक्षित रख दें।
-आसपास प्रशासन द्वारा चिह्नित शरण स्थलों का ब्यौरा, राहत बचाव दल, प्रशासनिक अधिकारियों, कंट्रोल रूम का नंबर अपने आप रखें।
-आपदा की स्थिति में तत्काल जानकारी संबंधित अधिकारियों और कंट्रोल रूम को दें।
-आपदा की स्थिति में एक दूसरे का सहयोग करें।
-यदि आपका घर, बरसाती नदियों, नालों के आसपास है तो जलस्तर पर नजर रखें।
-यदि बारिश थमने का नाम नहीं ले रही हो और जलस्तर लगातार बढ़ रहा हो तो ऊंचाई वाले स्थानों पर चले जाएं।
-राहत कार्यों में सेना, आईटीबीपी, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ जैसी सुरक्षा एजेंसियों की हर संभव मदद करें।
बरतें सावधानी:
-भारी बारिश हो रही हो तो नदियों, नालों के आसपास कतई न जाएं।
-जिला प्रशासन द्वारा दी जा रही सूचनाओं की अनदेखी न करें।
-किसी भी प्रकार की भ्रामक सूचनाएं और अफवाह न फैलाएं।
-ऐसे कार्य कतई न करें जिससे पानी का बहाव बस्तियों की तरफ हो जाए।
-पानी की निकासी में किसी भी प्रकार अवरोध न पैदा करें।
-बारिश या आसमान में बिजली कड़कने पर घर के इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बंद रखें।