अपनी ही जमीनें 'भूल' गया देहरादून नगर निगम
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देहरादून में नगर निगम की जमीनों पर कब्जे निगम के लिए बड़ी चुनौती हैं। निगम कब्जे हटाने की कोशिश तो करता है, लेकिन इसमें उसकी ही कमी आड़े आ जाती है। दरअसल, निगम अधिकारियों को ही यह ठीक-ठीक मालूम नहीं है कि शहर में कहां और कितनी जमीन निगम की है।
निगम सूत्र बताते हैं कि शहर में निगम की कई एकड़ जमीन खाली पड़ी है। लेकिन, इन जमीनों की स्थिति क्या है, ये कहां हैं, उन पर कब्जे हैं या नहीं, यह निगम को मालूम नहीं है। एक साल पूर्व निगम ने यह जानकारी जुटाने के लिए निजी कंपनी से सर्वे की तैयारी की थी, लेकिन काम शुरू नहीं हो सका।
ऐसे में निगम जमीनों पर कब्जे के मामलों को अदालत में चुनौती देने में पीछे रह जाता है, क्योंकि उसके पास कोई रिकार्ड नहीं है। जांच के लिए निगम तहसील के जमीन रिकार्ड पर निर्भर रहता है, लेकिन इसमें भी कई बार निगम को मुंह की खानी पड़ती है। इसके अलावा जमीनों का पता न होने से निगम शहर में कोई नई निर्माण योजना भी शुरू नहीं कर पाता।
मेयर विनोद चमोली बताते हैं कि सर्वे में 35-40 लाख रुपए खर्च होने के कारण पिछली बार कदम खींचने पड़े थे। लेकिन अब जल्द ही सर्वे कराया जाएगा।
जब कब्जे हुए, ‘आपका’ ही बोर्ड था मंत्रीजी
देहरादून नगर निगम की जमीनों पर अवैध कब्जों पर प्रदेश सरकार और नगर निगम आमने-सामने आ गए हैं। कैबिनेट मंत्री दिनेश अग्रवाल के निगम पर उठाए सवालों का मेयर विनोद चमोली ने कड़ा जवाब दिया है। उनका कहना है कि निगम की जमीनों पर हुए सभी कब्जे वर्ष 2008 से पूर्व के हैं।
और जब कब्जे हुए, तब निगम में कांग्रेस का ही बोर्ड था। मेयर ने कब्जों पर प्रदेश सरकार की मंशा पर भी सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि निगम कार्रवाई करना भी चाहे तो सरकार ही इसमें रोड़े अटकाती रहती है।
जांच का नतीजा क्या?
मेयर ने कहा कि कैबिनेट मंत्री भूल गए हैं कि निगम की जमीनों पर हुए कब्जों की नौ साल से विजिलेंस जांच चल रही है। कांग्रेस के बोर्ड ने ही इसे परवान नहीं चढ़ने दया। बताया कि वर्ष 2012 में उनके कार्यकाल में विजिलेंस को कब्जों की सूची सौंपी गई, लेकिन इन पर अब तक कार्रवाई नहीं र्हुई है। जांच की स्थिति क्या है, यह भी स्पष्ट नहीं है।
दोहरा मापदंड क्यों?
मेयर ने कहा कि प्रदेश सरकार कब्जों पर दोहरा मापदंड अपना रही है। निगम अतिक्रमण हटाने की कोशिश करे तो सरकार के विधायक प्रदर्शन करने लगते हैं। मुख्यमंत्री लगातार कह रहे हैं कि दून में एक भी झोपड़ी नहीं तोड़ने दी जाएगी। बस्तियों को नियमित किया जाएगा। फिर मंत्री निगम पर सवाल उठाते हैं। वहीं, कुछ मंत्री और विधायक ही बस्तियों में कब्जे करवा रहे हैं।
बनाई जाए संयुक्त टीम
मेयर का कहना है कि सही कोशिश हो तो नब्बे प्रतिशत कब्जे हटाए जा सकते हैं। कहा कि निगम ने लैंसडौन चौक से अवैध दुकानें हटाईं। इसी तरह रिस्पना पुल से लोगों को हटाकर 23 दुकानें दीं। इससे लैंसडौन चौक खुल गया।
लेकिन, अब फिर यहां फड़ लगने लगी हैं। सवाल किया कि पुलिस और लोक निर्माण विभाग कार्रवाई क्यों नहीं करते? कहा कि एमडीडीए, निगम, पुलिस और लोनिवि की संयुक्त टीम बने तो अतिक्रमण हट सकता है।
यह कहा था मंत्री ने
मंत्री दिनेश अग्रवाल ने नगर निगम पर आरोप लगाए थे कि वह अवैध कब्जे हटाने में असमर्थ है। कहा था कि निगम की जमीनों पर लगातार कब्जे हो रहे हैं और निगम हाथ बांधे बैठा है। कहा था कि राज्य सरकार अपने स्तर पर कब्जों की जांच करेगी।
मेयर के सवाल
- निगम की जमीन से कब्जे हटाने, अतिक्रमण हटाने में राज्य सरकार क्यों नहीं करती सहयोग?
- वर्ष 2005 में अवैध कब्जों पर शुरू हुई विजिलेंस जांच का क्या हुआ?
- सरकार क्यों नहीं चाहती कि विजिलेंस कब्जों पर तेजी से जांच करे?
- पुलिस सड़कों, फुटपाथों, चौराहों पर अतिक्रमण क्यों नहीं हटवाती?
- लोनिवि के पास सड़क पर अतिक्रमण पर 5000 रुपए जुर्माने का अधिकार है, विभाग बताए कि उसने अब तक ऐसे कितने जुर्माने किए?
गिनाए अपने काम
- नगर निगम ने वर्ष 2008 में ही शहर के विभिन्न थानों में 27 मुकदमे कराए, इनमें से 25 नामजद हैं। लेकिन पुलिस सुस्त बनी हुई है।
- नगर निगम वर्ष 2012 में ही कब्जों के 22 मामलों की सूची विजिलेंस को सौंप चुका है। लेकिन विजिलेंस से अब तक कार्रवाई नहीं हुई।
- निगम की जमीनों से र्कई बार अभियान चलाकर कब्जे हटाए गए हैं।
मंत्री और विधायक ही शहर में कब्जे करवा रहे हैं। इसके बाद भी ‘मंत्रीजी’ निगम पर ही सवाल उठाते हैं। प्रदेश सरकार मदद करे तो निगम की जमीनों से कब्जे हटाने में कोई दिक्कत न हो। लेकिन, सरकार ही हमारे कदम रोकती रहती है। यह दोगला रवैया ठीक नहीं। सरकार और मंत्रियों की मंशा साफ है तो हमारा साथ दें।
- विनोद चमोली, मेयर