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देहरादून नगर निगम नहीं देहरादून 'नरक' निगम
अमर उजाला, देहरादून
Updated Tue, 03 Dec 2013 12:43 PM IST
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दूसरे राज्यों में नगर निगम जहां करोड़ों रुपयों राजस्व कमा कर महानगरों का विकास कर रहे हैं, वहीं देहरादून में शहर का कूड़ा तक नहीं उठ पा रहा है।
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आपसी खींचतान और सियासत में नगर निगम इस कदर उलझ गया है कि कमाई तो दूर वह अपने जिम्मे का काम भी नहीं निपटा पा रहा है। इसी के चलते केंद्र का जेएनयूआरआरएम डोर-टू-डोर प्रोजेक्ट यहां फेल होने के कगार पर पहुंच चुका है।
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कमीशनखोरी और सरकारी दखल ने बनाया निठल्ला
वहीं कमीशनखोरी और सरकार के दखल ने निगम को और निठल्ला बना दिया है। किसी भी नगर निगम के लिए सबसे ‘बेसिक’ काम होता है शहर की सफाई व्यवस्था।
अब इसे विडंबना ही कहेंगे कि दून में सफाई व्यवस्था इस कदर चौपट हो चुकी है कि उसके लिए प्रमुख सचिव को सड़क पर उतरना पड़ रहा है और सरकार भी सीधे इसमें दखलअंदाजी कर रही है।
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निगम की आपसी राजनीति और खीचांतान के कारण जेएनएनयूआरएम योजना के तहत डोर-टू-डोर कूड़ा उठान का काम भी लगभग फ्लॉप होने के कगार पर पहुंच गया है। पहले चरण में शहर के बीस वार्डों से डोर-टू-डोर कूड़ा उठान बंद कर दिया गया है।
मेयर के निर्देशों को मानें
अभी कई और वार्डों से कंपनी कूड़ा उठान बंद कर सकती है। सूत्रों के अनुसार, कंपनी को फेल करने के पीछे कमीशनखोरी का खेल भी है।
वहीं निगम की राजनीति में विधायकों के दखल ने भी यहां का बेड़ा गर्क कर दिया है। कंपनी से बीस वार्ड इसलिए छीन लिए गए क्योंकि एक विधायक ने सरकार पर इसके लिए दबाव डाला था।
मेयर विनोद चमोली ने का कहना कि सरकार को जहां अधिकारियों पर अंकुश लगाते हुए उन्हें यह निर्देशित करना चाहिए कि वे मेयर के निर्देशों को मानें।
इसके उलट सरकार अधिकारियों को राजनीति करने के लिए उकसा रही है। उधर, विधायक भी सीधे निगम के काम में दखल दे रहे हैं। ऐसे में कैसे कोई मेयर नगर निगम चला पाएगा।
इनसे सबक ले नगर निगम
हैदराबाद की नगर निगम तीन सौ करोड़ रुपए से ज्यादा राजस्व हर साल कमाती है। इससे वह महानगर का सुंदरीकरण और विकास का कार्य करती है। हैदराबाद की सफाई व्यवस्था की सभी तारीफ करते हैं।
इतना ही नहीं मुरादाबाद नगर निगम भी अपने दम पर हर साल पचास करोड़ रुपए के विकास कार्य कराता है। यहां देहरादून नगर निगम अभी तक अपने पांव पर खड़ा भी नहीं हो सका है। जबकि यह राजधानी है।
पार्षदों को है टेंशन
जिन वार्डों में डोर-टू-डोर कूड़ा उठान अच्छी तरह से हो रहा था वहां के लोगों को भी अब इस प्रोजेक्ट से हाथ धोना पड़ सकता है। क्योंकि कांग्रेसी पार्षद डीवीडब्ल्यूएम कंपनी का विरोध कर रहे हैं।
ऐसे में उनकी मजबूरी है कि सभी पार्षदों को इसका विरोध करना होगा। सूत्रों के अनुसार, कई पार्षद चिंता में है। क्योंकि उनके क्षेत्र में कंपनी अच्छा काम कर रही थी। लेकिन मजबूरन उन्हें अब इसे हटाने की मांग करनी पड़ रही है। उन्हें डर है कि कहीं जनता पर इसका प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
प्रोजेक्ट के दूसरे चरण में भी संशय
जेएनएनयूआरएम प्रोजेक्ट के पहले चरण में डोर-टू-डोर कूड़ा उठान होना था। जबकि सेकेंड फेज में शीशमझाड़ी, सेलाकुई में कूड़ा निस्तारण प्लांट लगाया जाना था। उसमें केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने आपत्ति लगा दी थी।
इस बीच कई साल तक मामला लटकने के बाद कुछ माह पूर्व ही केंद्र ने उसे क्लीन चिट दे दी। नगर निगम के अधिकारी अभी तक दिल्ली से एनओसी तक नहीं ला पाए हैं।
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