देर-सवेर सोने और पीतल में फर्क कर लेती है जनता: रस्किन बांड
- आज दून इंटरनेशनल रीवरसाइड कैंपस में शुरू होने जा रहा है देहरादून लिटरेचर फेस्ट
- साहित्य, फिल्म, संस्कृति से जुड़े सितारे होंगे फेस्ट में शामिल, अमर उजाला है मीडिया पार्टनर
- पद्मभूषण रस्किन बांड और पूर्व केंद्रीय मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर करेंगे उद्घाटन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
पद्म भूषण साहित्यकार रस्किन बांड भारतीय साहित्य जगत में जेम्स बांड वाला रुतबा हासिल कर चुके हैं। 85 बरस की उम्र और डेढ़ सौ से ज्यादा किताबों का आंकड़ा छूने के बाद भी वे थके नहीं हैं। मसूरी में अपने छोटे से घर में वे लगातार ऑडियो रिकॉर्डिंग में व्यस्त रहते हैं और कड़े अनुशासन वाले दैनिक रुटीन के हिसाब से काम करते हैं।
भीड़, मोबाइल फोन और प्रकाशकों से दूर भागने वाले बांड मुश्किल से ही पहाड़ से नीचे उतरते हैं लेकिन बात जब बच्चों के साहित्य की हो तो वे यह तकलीफ भी उठा लेते हैं। आज रस्किन बांड देहरादून लिटरेचर फेस्टिवल के मुख्य अतिथि होंगे, जिसमें अमर उजाला एक्सक्लूसिव प्रिंट मीडिया पार्टनर की भू़मिका में हैं। कई बड़े नामों से सुसज्जित इस तीनदिवसीय लिटफेस्ट के उद्घाटन की पूर्वसंध्या पर रस्किन बांड ने अमर उजाला उत्तराखंड के संपादक संजय अभिज्ञान से खास बातचीत की। पढ़िए वार्ता के चुनिंदा अंश:
सोशल मीडिया से गंभीर साहित्य पर एक हद तक असर पड़ा
इंटरनेट के दौर में जब सब कुछ वर्चुअल और अशरीरी है, तब स्थूल किताबों का उत्सव मनाने वाली लिटफेस्ट गोष्ठियों से आप कितनी उम्मीद रखते हैं?
बहुत ज्यादा। पिछले साल इसी देहरादून लिटफेस्ट में मैंने एक ग्यारह साल की बच्ची को पुरस्कृत किया था। इस साल उसने मुझे अपनी पहली किताब के लांच के लिए बुलाया है। इन गोष्ठियों में सैकड़ों उभरते लेखकों से मिलने का मौका मिलता है। स्कूली बच्चों से साहित्य पर बातचीत के लिए एक खास सत्र मैंने रखवाया है।
अनेक किताबों का विमोचन भी हो रहा है। इन सब से पुस्तक संस्कृति पुष्ट होती है। इसलिए मैं बहुत आशान्वित हूं। हां, लेकिन इसी इंटरनेट ने किताबों के दर्जन भर विकल्प भी उतार दिए हैं। ई बुक्स, ई रीडर आदि तो हैं ही, साथ ही सोशल मीडिया भी है जिसका एक विराट मगर संदिग्ध साहित्यलोक विकसित हो गया है।
मैं मानता हूं। सोशल मीडिया से गंभीर साहित्य पर एक हद तक असर पड़ा है। लेकिन उम्मीद के बिंदु भी कई हैं। अब इंटरनेट पर सबसे ज्यादा शायद किताबें ही बिक रही हैं। किताबों के व्यापार और परिवहन में इंटरनेट ने क्रांति ला दी है। मेरा मानना है कि किताबें बड़ी सख्तजान होती हैं। उन्होंने पिछले सात-आठ दशकों में कई चुनौतियों को झेला है। रेडियो, टीवी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सके।
इंटरनेट और मोबाइल भी उन्हें गहरी चोट नहीं पहुंचा पाएंगे। वैसे भी किताबें पढ़ने और पसंद करने वाले हर दौर में कुछेक लोग ही होते हैं। मुझे याद है सन् बावन-तिरेपन के अपने स्कूल के दिन। तब भी दो-तीन स्टूडेंट ही लाइब्रेरी में किताबों में डूबे रहते थे। इसलिए सोशल मीडिया को लेकर एक सीमा से ज्यादा फिक्रमंद मैं नहीं। हालांकि मैं मोबाइल से परहेज रखता हूं और सोशल मीडिया पर नहीं हूं। फिर भी मैं उसका विरोध नहीं करता। नए लेखकों के बीच संवाद बढ़ाने में सोशल मीडिया बहुत सकारात्मक काम कर रहा है
पॉपुलर होने वाला साहित्य आमतौर पर हल्का साहित्य ही होता है
आपको लेखकों की नई पीढ़ी से बड़ी उम्मीद है। मगर नई पीढ़ी के कई बड़े नाम माइथोलॉजी यानी पुराकथाओं, अंधविश्वास और उथले साहित्य के सृजन में ज्यादा जोश दिखा रहे हैं? प्रोग्रेसिव, तरक्कीपसंद, वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने वाले साहित्य को लेकर क्या उदासीनता का माहौल नहीं?
उथला साहित्य रचा जा रहा है, यह ठीक है। लेकिन मैं इससे बहुत हैरान नहीं होता। पॉपुलर होने वाला साहित्य आमतौर पर हल्का साहित्य ही होता है। ऐसा पहले भी होता था। लुगदी साहित्य या पल्प फिक्शन कब नहीं था। अच्छी बात यह है कि ऐसा एक ही ढर्रे पर चलने वाला फैशनेबल साहित्य बड़ी जल्दी गुजर जाता है। वह मू्लतरू ट्रांजिटरी नेचर का होता है। टिकने वाला साहित्य तो गंभीर साहित्य ही होता है। जनता देर-सवेर सोने और पीतल का फर्क कर लेती है।
क्या साहित्य की धाराएं राजनीति से बेअसर रह सकती हैं। अगर विजेता इतिहास लिखते हैं तो क्या विजेता राजनेता साहित्य भी लिख सकते हैं?
हां, कुछ हद तक। लेकिन सिर्फ शार्ट रन में। लंबी अवधि में सच्ची समाज चेतना ही विजयी रहती है जो राजनीति से बेअसर रहती है। इसलिए मैं आशान्वित रहता हूं। इसीलिए मैं चाहता हूं कि ज्यादा से ज्यादा स्कूली बच्चे किताबें पढ़ें और किताबें लिखें। मुझे खुशी है कि अब बहुत से अभिभावक अपने बच्चों को लेखक बनाना चाह रहे हैं। यह देखना भी सुखद है कि आपका अखबार गंभीर साहित्य और किताबों के साथ खड़ा नजर आता है।