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माई सिटी हीरो: शिक्षा की रोशनी से गरीबी का अंधियारा दूर कर रही दून की मेघा

Sun, 20 Oct 2019 01:35 PM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाल, देहरादून
न्यूज डेस्क, अमर उजाल, देहरादून Published by: अलका त्यागी Updated Sun, 20 Oct 2019 01:35 PM IST
सार

  • देहरादून की मेघा मल्ल वंचित बच्चों को दे रहीं शिक्षा
  • चार बच्चों से शुरू हुआ सफर आज 40 बच्चों तक पहुंचा 

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Dehradun Girl Megha Mall give Free Education to 40 poor children
मेघा मल्ल - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

गरीबी किसी भी राष्ट्र एवं समाज के विकास में बाधा डालती है, लेकिन इस गंभीर समस्या का समाधान शिक्षा में है। अगर हर गरीब बच्चे को अच्छी शिक्षा मिल जाए तो वह अपनी आर्थिकी का कोई न कोई साधन जरूर खोज सकता है। इसी नेक सोच के साथ अपने मिशन को अंजाम दे रही हैं देहरादून की मेघा मल्ला। मेघा बीते कई वर्षों से मलिन बस्तियों के बच्चों को शिक्षा दे रही हैं।

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सुभाष नगर निवासी मेघा मल्ल ने बताया कि उन्होंने चार वंचित बच्चों से यह सफर शुरू किया था, जो आज 40 बच्चों तक पहुंच गया है। शुरुआती समय में संसाधनों के अभाव में वह खुले में क्लास लगाती थीं, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें इस नेक मुहिम में कई लोगों का साथ मिला।
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अब ट्रांसपोर्ट नगर में उन्होंने बच्चों की क्लास के लिए एक फ्लैट किराये पर ले रखा है। यहां बच्चों को उन्हें अंग्रेजी, गणित, विज्ञान, सामान्य ज्ञान समेत अन्य विषय पढ़ाए जाते हैं। वर्तमान में उन्होंने ‘युवती’ संस्था बनाई है। इसमें कई डॉक्टर व विभिन्न कॉलेजों की छात्राएं वॉलिंटियर्स के रूप में भी जुड़े हैं।

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ऐसे मिली प्रेरणा

मेघा बताती हैं कि करीब चार वर्ष पूर्व जब वह ट्रांसपोर्टनगर में पहुंचीं तो यहां कई वंचित बच्चों को देखा। वे कभी स्कूल नहीं गए थे। जब उनके सामने से इंग्लिश मीडियम स्कूल के बच्चे गुजरते थे, तो वे बच्चे उन्हें देखते रहते थे।

जब मैंने उन बच्चों से पूछा तो उन बच्चों ने भी स्कूल जाने की इच्छा जाहिर की, लेकिन उनके परिजनों के लिए दो वक्त की रोटी का बंदोबस्त करना ही मुश्किल होता था। इस कारण वे बच्चों के भविष्य के बारे में नहीं सोच पाते थे। 

परिजनों को जागरूक करना भी चुनौती
मेघा कहती हैं कि बच्चों को शिक्षा देना उतना कठिन नहीं, जितना बच्चों के परिजनों को मनाना। गरीबी के बीच रहकर परिजन शिक्षा के महत्व को समझ नहीं पाते और अपने बच्चों का भविष्य भी अंधकार में धकेलते हैं। इसलिए ऐसे परिजनों को समझाने में बेहद मेहनत करनी पड़ती है। उनके राजी होने के बाद ही बच्चों को क्लास में शामिल करते हैं। 

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