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देवीधुरा के बगवाल मेले में इस बार रक्षाबंधन पर नहीं बहेगा खून, रक्तदान कर लोग पेश करेंगे अनूठी नजीर

Sat, 11 Jul 2020 10:03 PM IST
अलका त्यागी चंद्रशेखर जोशी, अमर उजाला, चंपावत
चंद्रशेखर जोशी, अमर उजाला, चंपावत Published by: अलका त्यागी Updated Sat, 11 Jul 2020 10:03 PM IST
सार

  • देवीधुरा की बगवाल पेश करेगी नजीर, चारों खामों के लोग आपसी सहमति बनाने में जुटे   
  • कुछ योद्धाओं का तर्क परंपरा भी कायम रहेगी और कोविड-19 के नियम भी नहीं टूटेंगे 

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Coronavirus In Uttarakhand: People Decide to blood donation in Famous Stone War Devidhura bagwal Mela this Year
- फोटो : फाइल फोटो

विस्तार

मां बाराही धाम देवीधुरा में कोरोना महामारी के चलते लोग बगवाल के रोमांच से वंचित रहेंगे, लेकिन एक ऐसी नजीर के साक्षी जरूर बनेंगे, जिसे वह वर्षों तक याद रखेंगे। बगवाल में हिस्सा लेने वाले योद्धा सदियों पुरानी परंपरा को बरकरार रखने के लिए रक्तदान जैसे विकल्प पर विचार कर रहे हैं। ज्यादातर योद्धाओं का मानना है कि रक्तदान से वर्षों पुरानी मान्यता जहां टूटने से बचेगी वहीं कोविड-19 महामारी अधिनियम का उल्लंघन भी नहीं होगा। 

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हर साल रक्षाबंधन के दिन होने वाली बगवाल इस बार तीन अगस्त को होनी है, लेकिन कोरोना महामारी के संक्रमण को रोकने के लिए 28 जून को ही बगवाल नहीं करने का निर्णय लिया जा चुका है। ऐसे में बगवाल की परंपरा निभाने की गंभीर चुनौती है। मां बाराही मंदिर समिति और बगवाल से जुड़े योद्धाओं के समक्ष सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए देवी को प्रसन्न करने के लिए एक व्यक्ति के बराबर रक्त बहाने की परंपरा को निभाने की गंभीर चुनौती है।
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ऐसे में बगवाली वीर शिविर लगाकर रक्तदान के विकल्प पर विचार कर रहे हैं। हालांकि इसे अंतिम रूप देने से पहले अगले हफ्ते बगवाली वीरों के प्रतिनिधि मंत्रणा करेंगे। अगर रक्तदान शिविर पर मोहर लग जाती है तो यह एक नजीर साबित होगी। ऐसे में चारों खामों के प्रतिनिधि रक्तदान करेंगे।

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इसलिए होती है बगवाल 

देवीधुरा के चार प्रमुख खाम चम्याल, गहरवाल, लमगड़िया और वालिग खाम के लोग पूर्णिमा के दिन पूजा-अर्चना के बाद बगवाल खेलते हैं। माना जाता है कि पूर्व में यहां नरबलि दिए जाने का रिवाज था, लेकिन जब चम्याल खाम की एक वृद्धा के इकलौते पौत्र की बलि की बारी आई तो वंशनाश के डर से बुजुर्ग महिला ने मां बाराही की तपस्या की। देवी मां के प्रसन्न होने पर वृद्धा की सलाह पर चारों खामों ने आपस में युद्ध कर एक मानव बलि के बराबर रक्त बहाकर पूजा करने की बात स्वीकार कर ली, तब से बगवाल का सिलसिला बदस्तूर जारी है। 

कोरोना की वजह से बगवाल नहीं होने से मन व्यथित है, लेकिन रक्तदान का विकल्प सर्वाधिक उचित है। रक्षाबंधन को दो-ढाई बजे के बीच होने वाली बगवाल के दौरान शिविर लगा रक्तदान किया जा सकता है। 
त्रिलोक सिंह बिष्ट, प्रमुख, गहरवाल खाम। 

मेरी 76 वर्ष की उम्र है और ऐसा पहली बार है कि बगवाल नहीं हो रही है। रक्तदान कर बगवाल को नए तरीके से परिभाषित किया जा सकता है। इससे धर्म की भावना व मानव का कल्याण दोनों मुमकिन हो सकेंगे। 
बद्री सिंह बिष्ट, प्रमुख, वालिक खाम। 

पहली बार देवीधुरा की धरती बगैर बगवाल के होगी, इसका पालन किया जाएगा। ऐसे में सभी नियमों का पालन व प्रशासन से मंत्रणा कर रक्तदान के जरिए बगवाल की परंपरा को वैकल्पिक रूप दिया जा सकता है। 
वीरेंद्र सिंह लमगड़िया, प्रमुख, लमगड़िया खाम। 

बगवाल को लेकर लोगों में जबर्दस्त उत्साह रहता है। लेकिन इस बार परंपरा और रोमांच नजर नहीं आएगा। देवी को खुश करने के लिए रक्त बहाने की परंपरा के विकल्प पर सभी खामों के लोग मंत्रणा कर विचार करेंगे। 
गंगा सिंह चमियाल, प्रमुख चमियाल खाम। 

बगवाल मेला इस बार नहीं होगा, इस बारे में मंदिर कमेटी के साथ पहले ही अंतिम निर्णय लिया जा चुका है। सिर्फ पूजा-अर्चना होगी। शिविर के जरिए रक्तदान का निर्णय चारों खामों के प्रतिनिधियों को लेना है। बस सोशल डिस्टेंसिंग और कोविड-19 से संबंधित नियमों का पालन करना होगा। 
सुरेंद्र नारायण पांडेय, डीएम। 

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