यहां पर भाजपा से पिछड़ गई कांग्रेस
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16वीं लोकसभा के लिए बिछी बिसात पर अभी तक उत्तराखंड में कांग्रेस ने अपने मोहरे नहीं उतारे हैं। जबकि भाजपा के क्षत्रप तलवारें और ढाल लेकर चुनाव मैदान में उतर चुके हैं।
भाजपा ने करीब पन्द्रह दिन पहले अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए थे। इसका फायदा कहीं न कहीं उम्मीदवारों को जरूर मिलेगा।
भाजपा में टिकटों को लेकर इस बात पर हंगामा था कि उम्मीदवारों में एक नाम कैसे तय हो। जबकि कांग्रेस में जिस उम्मीदवार का नाम तय किया जाता है वही चुनाव लड़ने से इंकार कर दे रहा है।
हालांकि पार्टी की ओर जिलों में पदयात्राएं शुरू हो चुकी हैं और कांग्रेस के बड़े नेताओं से जुड़ी प्रचार सामग्री भी प्रदेश भर में दिखने लगी हैं।
भाजपा ने सेना उतारी, कदमताल शुरू
उत्तराखंड में भले ही आखिरी चरण में चुनाव होने हों लेकिन पार्टी ने होली से पहले नामों की घोषणा कर दी। पार्टी जानती थी कि टिकटों को लेकर पार्टी में घमासान भी मचेगा।
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मोदी लहर में भाजपा से चुनाव लड़ने वालों की लंबी सूची थी। तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों का टिकट लंबे समय से तय माना जा रहा था बावजूद उनके खिलाफ मजबूती से टिकट मांगने वाले थे।
भाजपा को अपने उम्मीदवार समय पर उतार देने का लाभ भी मिला है। जिस दौरान कांग्रेस अपने उम्मीदवारों को लेकर उलझी रही उस दौरान भाजपा अपने कील-कांटे दुरुस्त करने में जुटी रही।
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पार्टी और उम्मीदवारों के प्रयासों से बगावती तेवर शांत हुए जबकि एक समय ऐसा भी आया जब कुछ बड़े नेताओं के पार्टी छोड़ देने की खबर भी आई।
भाजपा के सभी उम्मीदवारों ने चुनाव कार्यालय खोलने के साथ इलाकों में दौरा भी शुरू कर दिया है। पौड़ी और अल्मोड़ा के दुर्गम इलाकों में भाजपा का प्रचार अभियान शुरू हो गया है।
कांग्रेस की सेना तैयार, कमांडर का इंतजार
ऐसे समय जब हिमाचल प्रदेश में होने वाले चुनाव के उम्मीदवार घोषित हो चुके हों, उत्तराखंड में प्रत्याशी घोषित ना होना कहीं न कहीं कांग्रेस में आपसी खींचतान को दर्शाता है। इसका खामियाजा पार्टी को अभी और चुनाव के दौरान भी उठाना पड़ेगा।
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हालांकि कांग्रेस उपाध्यक्ष सूर्य कांत धस्माना इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते हैं कि पार्टी पिछड़ गई है। उनका कहना है कि हमेशा से उम्मीदवारों का फैसला समय पर ही होता है।
लोकसभा का चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों पर लड़ा जाता है। केंद्रीय नेतृत्व ने अपना घोषणापत्र जारी कर दिया है। प्रदेश भर में जिला स्तर पर पदयात्राएं हो रही हैं।
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अभी उत्तराखंड में चुनाव की अधिसूचना भी जारी नहीं हुई है। उम्मीदवारों का महत्व है लेकिन पार्टी अपने सिम्बल और कार्यों पर चुनाव लड़ती है जिसका प्रचार-प्रसार कार्यकर्ता कर रहे हैं।
चुनाव लड़ने के नाम पर ही भाग रहे दिग्गज
होली के पहले ही कांग्रेस स्क्रीनिंग कमेटी की बैठक हो गई थी और पैनल केंद्रीय चुनाव समिति के पास भेज दिए गए थे। पौड़ी से सतपाल महाराज का एक मात्र नाम था। केंद्रीय नेतृत्व उन्हें ही लड़ाना चाहता था।
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चुनाव लड़ने के दबाव में उन्होंने पार्टी छोड़ दी। उनकी जगह पहले हरक सिंह रावत का नाम आया लेकिन बाद में वह भी मुकर गए। फिर स्वास्थ्य मंत्री सुरेन्द्र सिंह नेगी का नाम चला। प्रदेश इकाई की उधेड़बुन अभी इस सीट पर समाप्त नहीं हुई है।
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टिहरी से एक मात्र नाम विजय बहुगुणा का था। बहुगुणा लगातार चुनाव लड़ने से इंकार कर रहे हैं और पार्टी के नेता उन्हें घेरकर लड़ाना चाहते हैं।
प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर के नेताओं की कई चरणों में उनसे बातचीत भी हुई लेकिन अभी भी फैसला अटका है। मुख्यमंत्री हरीश रावत अभी अपनी सीट हरिद्वार पर भी अंतिम फैसला नहीं कर सके हैं।
क्या कहते हैं हरीश रावत
हमने रणनीति के तहत ही उम्मीदवारों की घोषणा में देर की है। चूंकि चुनाव अंतिम चरण में होने हैं ऐसा करने से चुनावी खर्च नहीं बढ़ेगा।