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बाल दिवस विशेष: देवभूमि में सुरक्षित नहीं 'बचपन', 10 माह के अपराधों ने तोड़ा 5 साल का रिकॉर्ड 

Wed, 14 Nov 2018 08:40 AM IST
न्यूज डेस्क/अमर उजाला, देहरादून
न्यूज डेस्क/अमर उजाला, देहरादून Updated Wed, 14 Nov 2018 08:40 AM IST
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Children Day 2018 child safety & security system special crime increase in uttarakhand

बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाए गए तमाम नियम कानूनों के बाद भी देवभूमि में उनके प्रति गंभीर अपराधों में कमी नहीं आ रही है। आंकड़े लगातार बढ़ रहे हैं। इन्हीं दस माह में हुए अपराधों ने पिछले पांच सालों के रिकार्ड तोड़ दिए हैं। इस दौरान बच्चों से जुड़े 505 आपराधिक मामले दर्ज किए गए हैं। 

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बच्चों के प्रति यौन अपराधों को रोकने के लिए वर्ष-2012 में प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल अफेंसेस एक्ट (पॉक्सो)-2012 अस्तित्व में आया था। इस एक्ट के तहत पहले के मुकाबले मुकदमों का तीव्र निस्तारण कर कड़ी सजा का प्रावधान किया गया है।
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फास्ट ट्रैक अदालतें गठित हुईं और अपराधियों को सजाएं भी जल्द से जल्द सुनाई गईं। इसके बाद उम्मीद जगी थी कि अब बाल अपराधों का ग्राफ गिरेगा। बावजूद इसके हालात बदतर होते चले गए।
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नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की वर्ष 2016 में आई एक रिपोर्ट में प्रदेश में सात गुना बाल अपराध बढ़ने की बात सामने आई थी। इनमें सर्वाधिक यौन उत्पीड़न से जुड़े मामले हैं। वर्ष 2013 में पोक्सो अधिनियम की विभिन्न धाराओं में 101 मुकदमे दर्ज किए गए थे। 

महज तीन सालों में ही यह आंकड़ा 338 तक पहुंच गया। हालात वर्ष 2017 में भी नहीं सुधरे। उस साल 440 मुकदमे दर्ज किए गए। इस वर्ष की बात करें तो महज 10 माह में पिछले पूरे पांच साल के रिकॉर्ड टूट गए हैं। इस दस माह में ही मुकदमों की संख्या 505 तक पहुंच गई है। सबसे ज्यादा अपराध हरिद्वार, इसके बाद देहरादून, ऊधमसिंह नगर और नैनीताल में दर्ज हुए हैं। 

बाल अपराधों के प्रति पुलिस गंभीरता से काम करती है। दोषियों के खिलाफ मजबूत पैरवी कर उन्हें कड़ी सजा दिलाने पर पुलिस का जोर रहता है। हाल ही में पोर्टल की शुरूआत की गई है। इस पर सीधे ऑनलाइन शिकायत की जा सकती है। 
अशोक कुमार, अपर पुलिस महानिदेशक (कानून व्यवस्था)

अपराध की डगर पर भी सरपट दौड़ रहा बचपन 

बाल अपराधों के विपरीत अपराधों में भी किशोरों की संलिप्तता तेजी से बढ़ रही है। राज्य गठन के वक्त प्रदेश में कुल पांच किशोर ऐसे थे जो किसी न किसी अपराध में शामिल रहे या उन पर आरोप लगा। अगले साल ही यह आंकड़ा दोगुना हो गया। तब से लगातार यह आंकड़ा बढ़ता जा रहा है।

राज्य गठन और बीते वर्ष की तुलना करें तो यह 54 गुना बढ़ गया है। वर्ष 2017 में किशोरों के खिलाफ 270 मुकदमे दर्ज किए गए। इनमें 343 किशोर पकड़े गए। इनमें से 177 के खिलाफ चालानी रिपोर्ट दी गई, जबकि 89 के खिलाफ गिरफ्तारी कर चार्जशीट दाखिल की गई। 

हर साल गायब हो जाते हैं 24 नौनिहाल 
प्रदेश में बच्चों के प्रति अपराध का एक चेहरा उनकी तस्करी से भी जुड़ा है। राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार राज्य गठन से अब तक कुल 6796 बच्चे गुमशुदा हैं। इनमें से 408 बच्चे हैं जिनका आज तक पता नहीं चल पाया। माना जाता है कि ये सभी तस्करी का शिकार हुए हैं। सालाना औसत पर गौर करें तो यह संख्या लगभग 24 बैठती हैं। यानी साफ है कि हर साल प्रदेश से 24 बच्चे गायब हो जाते हैं।  

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