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वन्य जीवों के आगे घुटने टेकने को मजबूर सरकार, बच्चों ने हाईकोर्ट में डाली अर्जी

Mon, 18 Dec 2017 03:30 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला,हल्द्वानी
ब्यूरो/अमर उजाला,हल्द्वानी Updated Mon, 18 Dec 2017 03:30 PM IST
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Children apply high court for protection from wildlife
हाईकोर्ट - फोटो : file photo

वन्यजीवों के आगे सरकार बेबस हुई, तो दूसरी ओर बच्चों ने उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर समस्या के समाधान की गुहार लगाई है।

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खेती को नुकसान पहुंचा रहे वन्य जीवों के आगे सरकार भी अब घुटने टेकने को मजबूर है। बंदरबाड़ा, बंदरों की नसबंदी आदि के बाद अब सरकार की किसानों को सलाह है कि ऐसी फसल लगाएं, जिन्हें जंगली जानवर नुकसान नहीं पहुंचाते। कृषि मंत्री सुबोध उनियाल के मुताबिक तारबाड़ ही सरकार अगर कराने लगे तो इसमें सालों लग जाएंगे।
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भाजपा प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में शामिल होने आए कृषि मंत्री सुबोध उनियाल के मुताबिक लेमनग्रास सहित अन्य कई ऐसे पौधे हैं, जिन्हें बंदर, लंगूर आदि नुकसान नहीं पहुंचाते। अब किसानों को इस बात के लिए प्रेरित किया जा रहा कि वे परंपरागत फसलों की जगह सगंध पादप, जड़ी-बूटी आदि की खेती करें। इससे उनकी आय में भी इजाफा होगा और वन्य जीवों के नुकसान से भी निजात मिलेगी।

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महिलाओं ने बंदर रजिस्टर बनाया, दस-दस के समूह में कर रही खेतों की रखवाली

Children apply high court for protection from wildlife
खेत - फोटो : demo
कृषि मंत्री की राय ऐसे समय में आई है जब पर्वतीय जिलों में महिलाएं और किसान बंदरों, लंगूरों और जंगली सुअरों से सब्जी की क्यारी बचाने की जद्दोजहद में जुटी हुए हैं। अल्मोड़ा के बच्चों ने उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर बंदरों के आंतक से निजात दिलाने की गुहार की थी।

यह मामला अभी उच्च न्यायालय में विचाराधीन है। हाल यह है कि कई गांवों में महिलाओं ने बंदर रजिस्टर बनाया हुआ है और महिलाएं दस-दस के समूह में खेतों की रखवाली कर रही हैं। कुछ स्थानों पर खेतों के किनारे साड़ियों को लहराने का प्रयोग भी किया गया।

राहत की बात यह है कि प्रदेश में परंपरागत खेती को अब प्रदेश सरकार व्यापक पैमाने पर प्रोत्साहित करने की योजना भी बना रही है। कृषि मंत्री के मुताबिक परंपरागत खेती के तीन हजार कलस्टर शुरू करने की केंद्र से अनुमति मिल गई है। एक कलस्टर करीब दस हेक्टेयर का होगा। प्रदेश में सामूहिक खेती भी शुरू की जा रही है और ‘मैं एक गांव योजना’ के जरिए इसकी शुरुआत की गई है।
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