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बीज के नाम पर किसानों के साथ धोखा
अमर उजाला, बिशन सिंह बोरा, देहरादून
Updated Tue, 17 Sep 2013 02:16 PM IST
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प्रदेश के किसानों को 75 फीसदी सब्सिडी पर जो ढेंचा बीज दिया गया था, वह असल में बीज था ही नहीं। यह मंडी से खरीदा गया जिन्स (अनाज) था। यही नहीं, जिन एजेंसियों से बीज खरीद दिखाई गई, वे भी फर्जी थीं।
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यह खुलासा हुआ है एससी त्रिपाठी आयोग को सौंपी गई जांच रिपोर्ट में। प्रमुख सचिव रणवीर सिंह की ओर से सशपथ प्रस्तुत रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि विभागीय सचिव के तौर पर उन्होंने जांच के आदेश दिए थे, लेकिन उनके स्थानांतरण के बाद जांच नहीं की गई।
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प्रमुख सचिव ने यह रिपोर्ट 23 जुलाई 2013 को सौंपी थी। बता दें कि वर्ष 2010 में पांच करोड़ रुपए के घोटाले का यह मामला वर्ष 2011 में खुला था।
दबाने की होती रही कोशिश
भाजपा शासनकाल के इस मामले में विभाग और शासन स्तर के अफसर और तत्कालीन मंत्री की भूमिका सवालों के घेरे में है। मामला खुलने के बाद चारों कृषि अधिकारियों के निलंबन का आदेश जारी हुआ था, लेकिन कुछ दिन बाद ही इसे बदल दिया गया।
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तत्कालीन अपर सचिव सुरेंद्र सिंह रावत के विजिलेंस जांच के प्रस्ताव को न सिर्फ ठुकराया गया, बल्कि जांच के आदेश देने वाले कृषि सचिव रणवीर सिंह को हटा दिया गया था। मामले में विजिलेंस जांच के प्रस्ताव पर भी तवज्जो नहीं दी गई।
सीबीसीआईडी जांच का प्रस्ताव विभागीय जांच के नाम पर टाल दिया गया। फर्म की ओर से विभिन्न जनपदों में बीज की जो आपूर्ति दिखाई, सिर्फ उसकी ही जांच की गई। अब फिर रणवीर सिंह प्रमुख सचिव बने हैं तो जांच में तेजी आई है।
ट्रकों के नंबर भी फर्जी
बीज आपूर्तिकर्ता फर्म ने बीज भेजने के लिए जिन ट्रकों के नंबर बताए थे, उनकी पुष्टि के लिए सेल्स टैक्स की दून और हरिद्वार के चिड़ियापुर स्थित चुंगियों के रिकार्ड जांचे गए। फर्म के बताए नंबर यहां नहीं मिले।
अफसरों, कर्मचारियों पर तलवार
आयोग को सौंपी गई रिपोर्ट के मुताबिक मामले में ऊधमसिंह नगर, नैनीताल, हरिद्वार और देहरादून के तत्कालीन मुख्य कृषि अधिकारियों के खिलाफ विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की गई है।
उन्हें आरोप पत्र देकर जांच आख्या पर लोक सेवा आयोग से सलाह मांगी गई है। इनके अलावा ऊधमसिंह नगर के 42, नैनीताल के 22, हरिद्वार के 53 और देहरादून के 33 कर्मचारियों को भी आरोपपत्र दिए गए हैं।