मुर्दे से जमीन खरीदने के मामले ने डीजीपी का दामन किया दागदार
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जिस अपराध के लिए वन विभाग ने बीएस सिद्धू के खिलाफ डीजीपी बनने से पहले चार्जशीट अदालत में दाखिल की थी, उसी मामले में रिटायरमेंट से एक दिन पहले शासन ने उन्हें एक चार्जशीट थमा दी।
राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू होते ही वक्त ने करवट बदलना शुरू कर दिया था। खासतौर पर नए मुख्य सचिव शत्रुघ्न सिंह को पुलिस विभाग में चल रहे तमाम विवादों ने बेचैन कर दिया था। उन्होंने पीएचक्यू के कई आदेश भी पलटे और जवाब-तलब भी किया।
यह शायद देश का पहला केस होगा, जब खुद के खिलाफ अदालत में दाखिल चार्जशीट के बावजूद बीएस सिद्धू डीजीपी बने और अब विदाई से ठीक पहले भी चार्जशीट मिल गई। यह अजीब संयोग है कि वन विभाग की उस चार्जशीट को उच्च न्यायालय से स्टे कराकर सिद्धू ने अपनी नौकरी पूरी कर ली और विदाई होने से पहले मंडरा रहे खतरे को भांपने में मात खा गए। यह आभास तो सिद्धू को भी नहीं होगा कि अंत में ऐसा कुछ होगा, जो कि पूरे ट्रैक रिकॉर्ड को दागदार कर देगा।
हरीश राज में डीजीपी ने चलाया अपना राज
खासतौर पर यह घटना विभाग में राजनीति करने वाले अफसरों के लिए किसी सबक से कम नहीं है। तमाम विरोध और सीबीआई जांच की अनुमति के बावजूद तत्कालीन सीएम विजय बहुगुणा ने उन्हें डीजीपी बनाया। उम्मीद तो थी कि पुलिसिंग बेहतर होगी, लेकिन कई विवाद जन्मते गए। हरीश रावत के राज में उन्होंने जो चाहा वही किया। इस दौरान उन्होंने कई विवादित फैसले किए।
मसलन, हाथीपांव से पेड़ कटने के जिस मामले में वन विभाग ने अभियुक्त को गिरफ्तार किया और कोर्ट ने उसे दोषी पाया, उसमें भी पुलिस ने वनकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया। भ्रष्टाचार पर खुद के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले दारोगा निर्विकार को मानवाधिकार आयोग की शरण लेनी पड़ी। लेकिन कुछ सवाल हैं, जो उनका पीछा करते रहेंगे।
1983 में मर चुके नत्थूलाल से फॉरेस्ट की जमीन कैसे खरीदी, नत्थूलाल को दी गई रकम वापस क्यों नहीं ली, जब मौके पर जंगल था तो फिर जमीन को क्यों खरीदा, अनुकूल जांच नहीं करने वाले पुलिस अफसरों के ही खिलाफ जांचें क्यों हुई ? चार्जशीट मिलने के बाद शनिवार को रिटायर हो रहे डीजीपी बीएस सिद्धू के सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले ग्रेच्युटी, पेंशन और अन्य लाभ समय से मिलने में भी अवरोध खड़े हो सकते हैं।