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विदेश गए, ज्ञान लिया और भूल गए
आफताब अजमत/ अमर उजाला, देहरादून
Updated Mon, 28 Apr 2014 11:51 AM IST
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इंडियन काउंसिल फॉर फॉरेस्ट्री रिसर्च एंड एजूकेशन(आईसीएफआरई) में हुए घोटालों में आला अधिकारियों की मिलीभगत भी सामने आ रही है।
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यात्राएं महज सैरसपाटा
अधिकारियों ने वर्ष 2011 से 2013 के बीच 142 विदेश यात्राओं पर 60.81 लाख रुपए खर्च किए, लेकिन वहां हासिल किया ज्ञान किसी के साथ नहीं बांटा। यानी यह यात्राएं महज सैरसपाटा ही साबित हुईं।
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक(कैग) की ताजा रिपोर्ट के तथ्य चौंकाने वाले हैं।
आईसीएफआई के पूर्व डीजी वीके बहुगुणा जुलाई 2011 से मार्च 2013 के बीच दस बार, पूर्व डीजी एके बंसल मई 2011 में तीन बार, एडीजी पंकज अग्रवाल मई 2011 से मार्च 2013 के बीच पांच बार विदेश यात्रा पर गए।
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इनके अलावा तमाम अधिकारी भी बार-बार विदेश यात्राओं पर गए।
केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को भेजी रिपोर्ट में सीएजी ने साफ किया है कि जिस विषय के लिए यह अधिकारी विदेश यात्रा पर गए थे, उसकी जानकारी वापस लौटकर एक भी वैज्ञानिक या कर्मचारी से साझा नहीं की गई।
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60 लाख के काम पर खर्च किए सवा करोड़
आईसीएफआरई ने इंडियन फॉरेस्ट्री रिसर्च इंफोर्मेशन सिस्टम (आईएफआरआईएस) डेवलप करने के लिए अगस्त 2008 में बंगलूरू स्थित शोभा रेनेस्सेंस इंफार्मेशन टेक्नोलॉजी(एसआरआईटी) प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के साथ करार किया।
इस कंपनी को 17 सॉफ्टवेयर बनाने थे। इसके लिए एक करोड़ 74 लाख 82 हजार 372 रुपए में कांट्रेक्ट हुआ और इसमें परफॉर्मेंस गारंटी के नाम पर 34 लाख 96 हजार 475 रुपए तय किए गए।
यानी अगर कंपनी ने सही परफॉर्मेंस न दी तो इतना पैसा लौटाना ही होगा। जबकि जून 2006 में तय किया गया था कि यही काम 60 लाख रुपये में होना है। अक्तूबर 2010 तक यह एसआरआईटी कंपनी महज 10 सॉफ्टवेयर ही बना पाई।
12वीं तकनीकी समिति ने पाया कि कंपनी द्वारा उपलब्ध कराए गए कागजात पर्याप्त नहीं थे। एक जनवरी से 19 नवंबर 2011 के बीच 13वीं तकनीकी समिति ने इस कंपनी के काम पर असंतुष्टी जाहिर की।
फरवरी 2012 में 14वीं तकनीकी समिति ने यह निर्णय लिया कि कंपनी ने समझौता नियमों का उल्लंघन किया है।
प्रोजेक्ट पूरा करने का केवल आश्वासन
22 मार्च 2012 को कंपनी ने दो माह के भीतर पूरा प्रोजेक्ट तैयार कर देने का आश्वासन दिया लेकिन यह नहीं हो पाया।
अंत में जून 2012 में तय किया गया कि कंपनी से परफॉर्मेंस गारंटी वाले 34 लाख 96 हजार 475 रुपए वापस लिए जाएंगे।
इस पर कंपनी सितंबर 2012 में नैनीताल हाईकोर्ट की शरण में चली गई। फिलहाल मामला कोर्ट में है लेकिन सीएजी ने साफ किया है कि आईसीएफआरई ने इस सौदेबाजी में नियमों की जमकर धज्जियां उड़ाई।
ऐसी कंपनी के साथ करार किया, जिसने कभी इस क्षेत्र में काम ही नहीं किया था। कंपनी द्वारा बनाया गया कोई भी सॉफ्टवेयर मार्च 2014 तक आईसीएफआरई के सभी नौ संस्थानों और चार केंद्रों के लिए कहीं से भी फायदेमंद नहीं हो पाया।