उत्तराखंडः कैग ने पकड़ी विभागों में 2,271 करोड़ की वित्तीय अनियमितता, लगी करोड़ों की चपत
- वन, समाज कल्याण और खाद्य विभाग की योजनाओं में भारी गड़बड़ी से लगी करोड़ों की चपत
- मृतकों को भी बांटी जाती रही वृद्धावस्था पेंशन, हजारों पेंशनरों का करोड़ों का एरियर लटकाया
- डयूटी से गायब रहे डाक्टरों ने करार भंग किया, फिर भी उनसे नहीं वसूली गई करोड़ों की धनराशि
- 149 करोड़ से अधिक की धनराशि का चावल जरूरत ज्यादा खरीदकर राजस्व को हानि पहुंचाई
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विस्तार
प्रदेश सरकार के विभिन्न विभागों और सार्वजनिक उपक्रमों की लापरवाहपूर्ण कारगुजारी से सरकार को 31 मार्च 2018 तक 2,271 करोड़ रुपये की चपत लगी है। यह खुलासा भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग) ने किया है। प्रदेश सरकार ने मंगलवार को सदन पटल पर कैग की यह रिपोर्ट रखी।
रिपोर्ट में प्रदेश की जनता से जुड़ी योजनाओं से जुड़े ऊर्जा, खाद्य एवं आपूर्ति, समाज कल्याण, चिकित्सा स्वास्थ्य एवं वन सरीखे विभागों की गंभीर कारस्तानियां उजागर हुई हैं। इन गड़बड़ियों के चलते जहां सरकार को सैकड़ों करोड़ रुपये की वित्तीय हानि हुई तो लाभार्थियों को भी योजनाओं का पूरा लाभ नहीं मिल सका।
मिसाल के तौर पर समाज कल्याण विभाग की वृद्धावस्था पेंशन योजना के तहत 34552 लाभार्थियों को पेंशन किस्त का भुगतान समय पर नहीं किया गया और न ही उन्हें 15.25 करोड़ रुपये के एरियर की भुगतान हुआ। विभागीय लापरवाही का आलम यह रहा कि मृतकों को भी पेंशन बांट दी गई। कैग ने यह तथ्य भी उजागर किया कि चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग ने उन डाक्टरों से करोड़ों रुपये वसूली नहीं की, जो करार तोड़कर डयूटी से गायब हो गए।
इसके अलावा खाते में धनराशि होने के बावजूद खाद्य एवं आपूर्ति विभाग ने आरबीआई से कर्ज उठाया, जिसके एवज में उसे 19.35 करोड़ के ब्याज की अदायगी करनी पड़ी। वहीं 0.63 लाख मीट्रिक टन चावल और 0.23 लाख मीट्रिक टन गेहूं वास्तविक आवश्यकता से ज्यादा वितरित कर करीब 149 करोड़ रुपये की चपत लगा डाली। सबसे भारी भरकम वित्तीय हानि वन एवं पर्यावरण विभाग में उजागर हुई है। अलग-अलग प्रकरणों में विभाग को 901.34 करोड़ रुपये की वित्तीय चपत लगी। इसमें राज्य वन विकास निगम की अनियमितता को जोड़ दें तो पूरे महकमे की ये हानि 905.82 करोड़ तक पहुंच जाती है।
प्रमुख विभागों में वित्तीय अनियमितता की राशि
वन - 905.82
खाद्य एवं आपूर्ति - 172.79
ऊर्जा - 229.22
समाज कल्याण - 81.58
चिकित्सा स्वास्थ्य - 18.00
खनन - 5.94
उच्च शिक्षा - 2.59
गृह - 3.17
लोनिवि - 1.69
नोट: अन्य विभागों व सार्वजनिक उपक्रमों की धनराशि अलग है।
कैग ने ये दिए सुझाव
वित्त प्रबंधन
1. स्वयं के कर राजस्व मेें कमी के कारणों की सरकार जांच करे और संसाधन सुधार के लिए उपाय करे। राजकोषीय घाटे को कम कर जीडीपी के 3.25 प्रतिशत तक लेकर आए।
2. सरकार अपने पूंजीगत व्यय को बढ़ा सकती है
3. प्रदेश के सार्वजनिक उद्यमों में पैसा लग रही सरकार इनसे लाभ लेने के तरीके का पता लगाए
4. अपूर्ण परियोजनाओं को समय से पूरा करे और यह सुनिश्चित करे कि आगे योजनाओं पर अतिरिक्त खर्च न हो
5. स्वास्थ्य क्षेत्र में प्रदेश सरकार और अधिक धन आवंटित कर सकती है
6. जीपीएफ की लागू दर पर ब्याज का प्रावधान करे
बजट प्रबंधन
1. सरकार अपने खर्च होने वाले बजट को और अधिक कठोर बनाए ताकि वह अनुदान और विनियोग में होने वाले अतिरिक्त खर्च से बच सके
2. सरकार यह तय कर ले कि आकस्मिक निधि से लिए गए पैसे को समय से वापस किया जाए और सिर्फ आकस्मिक कार्य के लिए ही इस पैसे का उपयोग किया जाए
सवा पांच अरब की कमाई, वन विभाग ने लापरवाही से गंवाई
एक तरफ प्रदेश सरकार वनों की सुरक्षा में करोड़ों रुपये खर्च कर रही है। वहीं दूसरी तरफ, वन विभाग लापरवाही के चलते कमाई के थोड़े बहुत अवसर भी गंवा रहा है। इसी का परिणाम रहा कि 530.47 करोड़ रुपये की कमाई भी वन विभाग ने गंवा दी। कैग रिपोर्ट के मुताबिक वन विभाग समय से कई वर्किंग प्लान बनाने में असफल रहा। हद तो यह हुई कि विभाग ने साल के जंगलों की छंटाई के लिए कोई योजना नहीं बनाई। प्रदेश में साल की लकड़ी का वन विभाग व्यवसायिक उपयोग की इजाजत देता है। साल के पेड़ को पर्याप्त सूर्य की रोशनी चाहिए होती है।
ऐसे में छंटाई न होने से साल के जंगलों की गुणवत्ता भी प्रभावित हो रही है। कैग ने वन विभाग की आंतरिक लेखा परीक्षा पर भी सवाल उठाया है। कैग ने पाया कि 11 वन प्रभागों में 19.05 करोड़ रुपये के एरियर की वसूली नहीं हुई। आठ वन प्रभागों में 2308 अपराध के मामले विभागीय स्तर पर लंबित थे। 1025 मामले तो ऐसे थे, जिनमें कार्यवाही तीन साल से लंबित थी।
11 वन प्रभागों में 9053.21 हेक्टेयर वन भूमि पर अतिक्रमण था। 125.56 हेक्टेयर अतिक्रमित वन भूमि को नियमित करने की कार्यवाही 2001 में शुरू हुई थी। 121 मामलों में तो अदालत ने अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया था लेकिन विभाग ने कोई कार्यवाही नहीं की। जनवरी 2019 में वन विभाग ने बताया था कि अतिक्रमण हटाने की कार्यवाही की जा रही है।
मुख्य बिंदु...
1. वर्किंग प्लान समय से बनाने में वन विभाग असफल रहा। दस साल के लिए बनने वाले इस वर्किंग प्लान के आधार पर ही वनों में विभाग काम कर पाता है। कैग ने पाया कि 24 वर्किंग प्लान समय से नहीं बनाए गए। इससे दो वन प्रभागों में पेड़ नहीं काटे जा सके और विभाग को 75.37 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।
2. साल के जंगलों में केनोपी ऑपनिंग (पेड़ों की छंटाई) न होने से 320.12 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ और इससे नए साल के पेड़ों के विकास पर भी बुरा प्रभाव पड़ा ।
3. रायल्टी में 42.18 करोड़ रुपये का नुकसान।
4. 2013 से 2018 के बीच यूके लिप्टस पेड़ों की गलत रायल्टी निर्धारण के कारण 31.19 करोड़ रुपये का नुकसान।
5. वन विकास निगम ने जलौनी लकड़ी की नीलामी में 13.94 करोड़ रुपये और पेड़ों की जड़ों की नीलामी से 42.17 करोड़ रुपये कमाएं। निगम को यह पैसा मिल ही नहीं पाया।
6. बदरीनाथ और टिहरी वन प्रभाग चीड़ के पेड़ों से मिलने वाले रेजिन को समयबद्ध रूप से निकालने की व्यवस्था नहीं कर पाया। इस वजह से 2.39 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।
7. वर्किंग प्लान में चीड़ पेड़ों से रेजिन निकालने के लिए व्यवस्था न होने के कारण विभाग को 2.47 करोड़ रुपये हर साल का नुकसान उठाना पड़ा।
8. उपखनिज पर परिवहन शुल्क के गलत निर्धारण के कारण विभाग को 72.27 लाख का नुकसान हुआ।
9. आठ लीज मामलों में 417.95 करोड़ रुपये वसूल करने में विभाग असफल रहा।
अफसर अधिक, फील्ड में काम करने वाले कम
वन विभाग में प्रमुख वन संरक्षक स्तर के अधिकारियों की अधिकता है और वन क्षेत्राधिकारियों, वन रक्षकों की कमी है। कैग ने माना कि फील्ड में कर्मियों की कमी के कारण वन विभाग अवैध रूप से पेड़ों के कटान, वन क्षेत्र में अवैध खनन जैसे मामलों पर प्रभावी नियंत्रण नहीं कर पा रहा है।