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फिल्मों में फ्री में काम करेंगे बॉलीवुड स्टार

अमर उजाला, देहरादून Updated Tue, 06 May 2014 08:25 AM IST
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गढ़वाली सिनेमा को चार मई (रविवार) को 31 साल पूरे गए। लेकिन भोजपुरी, गुजराती, मराठी समेत दूसरी क्षेत्रीय फिल्म इंडस्ट्रियों के मुकाबले प्रदेश का सिनेमा कहीं नहीं ठहरता।
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दुर्दशा के लिए सरकार जिम्मेदार
तरक्की के बजाय गढ़वाली-कुमाऊंनी फिल्मों की संख्या घट गई है। यह स्थिति बॉलीवुड में सक्रिय उत्तराखंड के कलाकारों को भी चुभती है। मुंबई में जम चुके कलाकार गढ़वाली फिल्मों की दुर्दशा के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराते हैं।
उनका कहना है कि प्रदेश में फिल्म निर्माण की बेहतर सुविधाएं और सब्सिडी मिले तो गढ़वाली सिनेमा का विकास हो सकता है। इसके अलावा वे जनता में भी अपनी संस्कृति के प्रति जागरूकता के अभाव पर चिंता जताते हैं।

वे यह भी कहते हैं कि ‘अपनी’ फिल्में मिलें तो वे निशुल्क काम करने के लिए तैयार हैं।

प्रोड्यूसरों की जरूरत
मैं कलाकार हूं, कमांडिंग नहीं कर सकता। फिल्म बनाने के लिए प्रोड्यूसरों की जरूरत होती है। क्षेत्रीय सिनेमा को ऐसे लोगों की जरूरत है जो कमाई पर ध्यान न देकर उत्तराखंड की फिल्म इंडस्ट्री को मजबूत आधार प्रदान करें। अपने क्षेत्र की फिल्मों के प्रस्ताव आएंगे तो मैं फ्री में काम करूंगा। हाल ही में ‘राजुला’ फिल्म में मैंने काम किया, लेकिन कोई डिमांड नहीं रखी थी। फिल्म निर्माता ने जितने पैसे दिए, सहर्ष लिए। बड़ी दिक्कत संसाधनों की है। सरकार की इसमें अहम भूमिका है। सरकार चाहे तो बुनियादी जरूरतें मुहैया करा बड़ी मदद कर सकती है।
- हेमंत पांडे, बालीवुड अभिनेता

सबसे बड़ा काम सरकार को करना है। उत्तराखंड में बेहतरीन लोकेशन हैं, लेकिन इनका कोई लाभ नहीं मिलता। प्रदेश सरकार को उत्तराखंड में फिल्म सिटी बनानी चाहिए। बाहरी फिल्म मेकर्स को बुलाया जाए और कुछ सब्सिडी दी जाए। इससे प्रदेश की लोकेशन को देश-दुनिया जानेंगे। स्थानीय कलाकारों को काम का मौका मिलेगा। इसके बाद प्रादेशिक सिनेमा को बढ़ावा देना चाहिए। जहां तक मेरा सवाल है, मैं कई फिल्मों को सिर्फ इसलिए हां कर देती हूं कि शूटिंग उत्तराखंड में होगी। हाल में मैंने कुछ छोटी फिल्में इसी वजह से कीं।
- हिमानी शिवपुरी, अभिनेत्री

उत्तराखंड में सिनेमा के पिछड़ने में सरकारी मदद तो वजह है ही। इससे बड़ी वजह यह है कि स्थानीय लोग ही अपनी संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं। उत्तराखंड में ही गढ़वाली-कुमाऊंनी फिल्मों से अधिक हिंदी फिल्में देखी जाती हैं। हम मुंबई में रहते हैं, लेकिन यहां अधिक से अधिक गढ़वाली, कुमाऊंनी फिल्में देखते हैं। जनता को भी जागरूक होना होगा। मुझे उत्तराखंड के क्षेत्रीय फिल्म निर्माताओं की ओर से प्रस्ताव मिलते हैं तो मेरे लिए गर्व की बात होगी। अपनी संस्कृति के बढ़ावे के लिए मैं फ्री में काम करूंगा।
- राकेश कुकरेती, अभिनेता
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