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दून अस्पताल ब्लड बैंक में खून का जबरदस्त संकट, ब्लड बैंक में सिर्फ नौ यूनिट ब्लड
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कोरोना संकट के बीच राजधानी के तीन प्रमुख ब्लड बैंकों में खून का भारी संकट पैदा हो गया है। आलम ये है कि दून अस्पताल ब्लड बैंक में केवल नौ यूनिट खून शेष रह गया है। वहीं, आईएमए और एसएमआई ब्लड बैंक में भी खून का स्टॉक बेहद कम हो गया है।
कोविड-19 के कारण पिछले काफी समय से रक्तदान शिविर बेहद कम संख्या में आयोजित हो रहे हैं। स्कूल-कॉलेज भी पूरी तरह बंद हैं, जहां से सबसे ज्यादा मात्रा में खून जमा होता है। इसके अलावा नियमित रक्तदाता भी इन दिनों ब्लड बैंक आने से बच रहे हैं। इन सब वजहों से ब्लड बैंकों में खून का स्टॉक धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। सबसे खराब हालत दून अस्पताल ब्लड बैंक की है, जहां पहले ही मरीजों का दबाव बहुत ज्यादा है। खून की कमी होने के कारण ब्लड बैंक अधिकारियों की चिंता बढ़ने लगी है। उनका कहना है कि अगर जल्द ही हालात में सुधार नहीं हुआ तो अति गंभीर मरीजों को भी जरूरत का खून नहीं मिल पाएगा। इससे उनके जीवन पर खतरा बढ़ जाएगा।
दूसरी ओर, आईएमए ब्लड बैंक में भी करीब दो सौ यूनिट खून ही शेष रह गया है। ब्लड बैंक में 3500 यूनिट ब्लड स्टोर करने की क्षमता है। सामान्य दिनों में यहां दो हजार से ज्यादा का स्टॉक रहता है, लेकिन इन दिनों स्थिति एकदम अलग है। श्रीमहंत इंदिरेश अस्पताल ब्लड बैंक की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। यहां दो हजार स्टोरेज क्षमता वाले ब्लड बैंक में करीब दो सौ यूनिट ही खून बचा हुआ है। ये स्थिति तब है जबकि यहां नियमित तौर पर छोटे-छोटे कैंप लगते रहे हैं।
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पिछले कई महीने से ब्लड बैंक में रक्तदान बेहद कम संख्या में हो रहा है। यहां तक कि नियमित रूप से रक्तदान करने वाले रक्तदाता भी नहीं आ रहे हैं। खून की कमी को देखते हुए हम लगातार रक्तदाताओं को फोन कर रक्तदान की अपील कर रहे हैं। हालांकि कोविड के खतरे को देखते हुए लोग अभी अस्पताल आने से बच रहे हैं। इस दौरान बाहर भी कैंप नहीं लगे हैं। दून में कोविड अस्पताल होने के कारण भी लोग नहीं आ रहे हैं।
- डा. शशि उप्रेती, प्रभारी, दून अस्पताल ब्लड बैंक
अन्य वर्षों में इस समय कॉलेजों में सबसे ज्यादा कैंप लगते रहे हैं। मरीजों की खून की जरूरत का सबसे बड़ा हिस्सा यहीं से आता है। दून के तमाम बड़े विश्वविद्यालय और कॉलेज हजारों यूनिट रक्तदान करते हैं, जिससे कई जरूरतमंदों की जान बचती है। कोविड-19 के खतरे के कारण कॉलेज पूरी तरह बंद हैं, जिससे खून की कमी होनी स्वाभाविक है। लोग कोविड के खतरे को देखते हुए अस्पताल या ब्लड बैंक आने से बच रहे हैं।
- कमल साहू, समन्वयक, आईएमए ब्लड बैंक
हर महीने सैकड़ों यूनिट खून की जरूरत हमारे अस्पताल में ही पड़ती है। इसके अलावा अन्य अस्पतालों में भर्ती गंभीर मरीजों के परिजन भी यहां से खून ले जाते हैं। सामान्य दिनों में कई रक्तदाता नियमित स्वैच्छिक रक्तदान करते हैं। तमाम कॉलेज, सामाजिक और राजनीतिक संगठन कैंप लगाते हैं, जिससे खून की बहुत ज्यादा कमी नहीं होती। कोरोना के कारण इस साल सब कुछ बंद है, जिसके कारण खून का संकट बढ़ गया है।
- अमित चंद्रा, समन्वयक, एसएमआई ब्लड बैंक
थैलीसीमिया पीड़ित नौनिहालों के इलाज में भी संकट
बता दें कि तमाम ऐसे थैलीसीमिया पीड़ित बच्चे हैं जिनका इलाज चल रहा है और उन्हें एक निश्चित अंतराल में खून चढ़ाना पड़ता है। ऐसे बच्चों को ब्लड बैंक से मुफ्त खून उपलब्ध कराया जाता है। लेकिन अब जबकि स्वैच्छिक रक्तदाता रक्तदान करने को आगे नहीं आ रहे हैं तो थैलीसीमिया पीड़ित बच्चों के इलाज के लिए भी संकट खड़ा हो गया है।
करके देखिये! अच्छा लगता है...
देहरादून। एक यूनिट रक्तदान से आप तीन लोगों की जान बचा सकते हैं। अगर आप 18 से 60 वर्ष आयु के स्वस्थ व्यक्ति हैं तो हर तीन माह के अंतराल में सुरक्षित रूप से रक्तदान कर सकते हैं। डॉक्टरों के अनुसार, रक्तदान से किसी तरह की परेशानी नहीं होती। सुरक्षित रूप से रक्तदान करने पर शरीर में किसी तरह की कमजोरी भी नहीं आती। शरीर अगले 24 से 48 घंटों के दौरान निकाले गए रक्त की पूर्ति कर लेता है। गर्भवती महिलाएं, हृदय रोग, कैंसर, मधुमेह, थायरायड और टीबी जैसी बीमारियों से पीड़ित मरीज रक्तदान नहीं कर सकते। मुश्किल के इस वक्त में सभी राजनीतिक, सामाजिक संगठनों व संस्थाओं को रक्तदान के लिए आगे आने की जरूरत है। सभी ब्लड बैंकों में कोविड से सुरक्षा के लिए पर्याप्त इंतजाम किए जा रहे हैं।
कई संगठनों ने निभाई मानवता
देहरादून। कोविड-19 के दौरान कई संगठनों ने नियमित रक्तदान कर मानवता का धर्म निभाया। उन्हीं के प्रयासों का नतीजा है कि अन्य माध्यम से आवक घटने के बावजूद अब तक बहुत ज्यादा परेशानी नहीं हुई। भाजयुमो कार्यकर्ताओं ने इस दौरान कई शिविर आयोजित किए, जिसमें दो हजार यूनिट से ज्यादा खून इकट्ठा किया गया।
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कोविड-19 के कारण पिछले काफी समय से रक्तदान शिविर बेहद कम संख्या में आयोजित हो रहे हैं। स्कूल-कॉलेज भी पूरी तरह बंद हैं, जहां से सबसे ज्यादा मात्रा में खून जमा होता है। इसके अलावा नियमित रक्तदाता भी इन दिनों ब्लड बैंक आने से बच रहे हैं। इन सब वजहों से ब्लड बैंकों में खून का स्टॉक धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। सबसे खराब हालत दून अस्पताल ब्लड बैंक की है, जहां पहले ही मरीजों का दबाव बहुत ज्यादा है। खून की कमी होने के कारण ब्लड बैंक अधिकारियों की चिंता बढ़ने लगी है। उनका कहना है कि अगर जल्द ही हालात में सुधार नहीं हुआ तो अति गंभीर मरीजों को भी जरूरत का खून नहीं मिल पाएगा। इससे उनके जीवन पर खतरा बढ़ जाएगा।
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दूसरी ओर, आईएमए ब्लड बैंक में भी करीब दो सौ यूनिट खून ही शेष रह गया है। ब्लड बैंक में 3500 यूनिट ब्लड स्टोर करने की क्षमता है। सामान्य दिनों में यहां दो हजार से ज्यादा का स्टॉक रहता है, लेकिन इन दिनों स्थिति एकदम अलग है। श्रीमहंत इंदिरेश अस्पताल ब्लड बैंक की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। यहां दो हजार स्टोरेज क्षमता वाले ब्लड बैंक में करीब दो सौ यूनिट ही खून बचा हुआ है। ये स्थिति तब है जबकि यहां नियमित तौर पर छोटे-छोटे कैंप लगते रहे हैं।
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पिछले कई महीने से ब्लड बैंक में रक्तदान बेहद कम संख्या में हो रहा है। यहां तक कि नियमित रूप से रक्तदान करने वाले रक्तदाता भी नहीं आ रहे हैं। खून की कमी को देखते हुए हम लगातार रक्तदाताओं को फोन कर रक्तदान की अपील कर रहे हैं। हालांकि कोविड के खतरे को देखते हुए लोग अभी अस्पताल आने से बच रहे हैं। इस दौरान बाहर भी कैंप नहीं लगे हैं। दून में कोविड अस्पताल होने के कारण भी लोग नहीं आ रहे हैं।
- डा. शशि उप्रेती, प्रभारी, दून अस्पताल ब्लड बैंक
अन्य वर्षों में इस समय कॉलेजों में सबसे ज्यादा कैंप लगते रहे हैं। मरीजों की खून की जरूरत का सबसे बड़ा हिस्सा यहीं से आता है। दून के तमाम बड़े विश्वविद्यालय और कॉलेज हजारों यूनिट रक्तदान करते हैं, जिससे कई जरूरतमंदों की जान बचती है। कोविड-19 के खतरे के कारण कॉलेज पूरी तरह बंद हैं, जिससे खून की कमी होनी स्वाभाविक है। लोग कोविड के खतरे को देखते हुए अस्पताल या ब्लड बैंक आने से बच रहे हैं।
- कमल साहू, समन्वयक, आईएमए ब्लड बैंक
हर महीने सैकड़ों यूनिट खून की जरूरत हमारे अस्पताल में ही पड़ती है। इसके अलावा अन्य अस्पतालों में भर्ती गंभीर मरीजों के परिजन भी यहां से खून ले जाते हैं। सामान्य दिनों में कई रक्तदाता नियमित स्वैच्छिक रक्तदान करते हैं। तमाम कॉलेज, सामाजिक और राजनीतिक संगठन कैंप लगाते हैं, जिससे खून की बहुत ज्यादा कमी नहीं होती। कोरोना के कारण इस साल सब कुछ बंद है, जिसके कारण खून का संकट बढ़ गया है।
- अमित चंद्रा, समन्वयक, एसएमआई ब्लड बैंक
थैलीसीमिया पीड़ित नौनिहालों के इलाज में भी संकट
बता दें कि तमाम ऐसे थैलीसीमिया पीड़ित बच्चे हैं जिनका इलाज चल रहा है और उन्हें एक निश्चित अंतराल में खून चढ़ाना पड़ता है। ऐसे बच्चों को ब्लड बैंक से मुफ्त खून उपलब्ध कराया जाता है। लेकिन अब जबकि स्वैच्छिक रक्तदाता रक्तदान करने को आगे नहीं आ रहे हैं तो थैलीसीमिया पीड़ित बच्चों के इलाज के लिए भी संकट खड़ा हो गया है।
करके देखिये! अच्छा लगता है...
देहरादून। एक यूनिट रक्तदान से आप तीन लोगों की जान बचा सकते हैं। अगर आप 18 से 60 वर्ष आयु के स्वस्थ व्यक्ति हैं तो हर तीन माह के अंतराल में सुरक्षित रूप से रक्तदान कर सकते हैं। डॉक्टरों के अनुसार, रक्तदान से किसी तरह की परेशानी नहीं होती। सुरक्षित रूप से रक्तदान करने पर शरीर में किसी तरह की कमजोरी भी नहीं आती। शरीर अगले 24 से 48 घंटों के दौरान निकाले गए रक्त की पूर्ति कर लेता है। गर्भवती महिलाएं, हृदय रोग, कैंसर, मधुमेह, थायरायड और टीबी जैसी बीमारियों से पीड़ित मरीज रक्तदान नहीं कर सकते। मुश्किल के इस वक्त में सभी राजनीतिक, सामाजिक संगठनों व संस्थाओं को रक्तदान के लिए आगे आने की जरूरत है। सभी ब्लड बैंकों में कोविड से सुरक्षा के लिए पर्याप्त इंतजाम किए जा रहे हैं।
कई संगठनों ने निभाई मानवता
देहरादून। कोविड-19 के दौरान कई संगठनों ने नियमित रक्तदान कर मानवता का धर्म निभाया। उन्हीं के प्रयासों का नतीजा है कि अन्य माध्यम से आवक घटने के बावजूद अब तक बहुत ज्यादा परेशानी नहीं हुई। भाजयुमो कार्यकर्ताओं ने इस दौरान कई शिविर आयोजित किए, जिसमें दो हजार यूनिट से ज्यादा खून इकट्ठा किया गया।