छावनी चुनावः तो इसलिए BJP को मिली करारी हार
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देहरादून के क्लेमेंटाउन में चुनाव नतीजों से एक दिन पहले तक पांचों सीटों पर जीत का दावा कर रही उत्तराखंड भाजपा की नतीजे आने के साथ हवा निकल गई।
इसके पीछे पार्टी के भीतर गुटबाजी और कई गलत फैसलों के अलावा निवर्तमान उपाध्यक्ष भूपेंद्र कंडारी के खिलाफ माहौल बनना भी वजह रही।
क्लेमेंटटाउन कैंट बोर्ड में उपाध्यक्ष रहते हुए भूपेंद्र कंडारी ने काम तो कराया, लेकिन कई लोगों की नाराजगी भी मोल लेते गए। स्थानीय नेताओं को दरकिनार कर लिए गए फैसले भी पार्टी पर भारी पड़े।
स्थिति यह थी कि भूपेंद्र कंडारी को खुद भी अपने गृह वार्ड दो को छोड़कर वार्ड तीन से मैदान में उतरना पड़ा। वार्ड चार पर लाख विरोधों के बावजूद सुशीला रावत को पार्टी ने टिकट दे दिया। मुस्लिम बहुल वार्ड सात में पार्टी ने प्रत्याशी के चयन में मात खाई।
बड़े नेता रहे नदारद
वार्ड दो में मोहन जोशी की दावेदारी मजबूत थी, लेकिन पार्टी ने कुछ अन्य दावेदारों की वजह से किसी को टिकट नहीं दिया। स्थिति यह हो गई कि यहां भाजपा नेता अलग-अलग प्रत्याशियों के साथ दिखे।
वार्ड पांच में तीन बार के सभासद नरेंद्र सिंह चुनावी मैदान में थे, लेकिन यहां उनके खिलाफ माहौल को भाजपा भांप नहीं पाई। नतीजतन गत चुनावों में दूसरे स्थान पर रहे टेक बहादुर ने बाजी अपने नाम कर ली। चुनाव के दिन तक जनता के बीच भाजपा के टिकट संबंधी फैसलों को लेकर भी नाराजगी नजर आई।
वर्ष 2008 के चुनावों में उपाध्यक्ष पर कब्जा जमाने और इस बार पांच वार्डों में पार्टी टिकट देने के बावजूद पार्टी के बड़े नेता चुनाव से दूर ही रहे। मेयर विनोद चमोली को छोड़कर पार्टी के मंडल और महानगर के पदाधिकारियों का यहां कदम न रखना भी हार की वजह बना।
पिछली बार था पूरा ‘बोर्ड’
भाजपा ने पिछले चुनाव में सात में से पांच सीट पर अपने उम्मीदवारों की जीत दर्ज की थी। भूपेंद्र कंडारी के नेतृत्व में इस बड़ी जीत के बाद छावनी परिषद में भाजपा बहुमत से आगे निकल गई थी। लेकिन इस बार भाजपा औंधे मुंह गिर गई।