उत्तराखंड को कांग्रेस मुक्त करने में असफल साबित हो रही भाजपा
भाजपा की कांग्रेस मुक्त प्रदेशों की रणनीति को अन्य प्रदेशों में मिल रही कामयाबी उत्तराखंड में विफल साबित हो रही है।
विधानसभा चुनाव से ठीक पहले भाजपा को कांग्रेस से हर सियासी बिसात पर मिली मात से प्रदेश और केंद्र की रणनीति पर सवाल ख़ड़ा कर दिया है। रणनीतिक लिहाज से कई बड़े चेहरों का मार्च से चल रहे सियासी संकट में कहीं नहीं दिखे।
रणनीति तैयार करने में सिर्फ कुछ चेहरे शामिल होने से करने को भी पैदा हुई स्थितियों के लिए वजह माना जा रहा है। अब नए सिरे से चल रही कसरत में पुराने चेहरों के साथ कांग्रेस छोड़ भाजपा में आए दिग्गजों को रणनीति का हिस्सा बना चुनावी मैदान में उतरने की सबसे बड़ी चुनौती पार्टी के सामने रहेगी।
मार्च 18 के बाद प्रदेश में जो स्थितियां पैदा हुई उसके बाद भाजपा को हर फ्रंट पर मात मिलती दिख रही है। कांग्रेस से दस विधायक तोड़ने के बाद भी भाजपा मजबूत होती नहीं दिख रही। कांग्रेस पर लग रहे गढ़वाल की अनदेखी भाजपा में होती भी दिख रही है।
BJP के बड़े चेहरे प्लानिंग का हिस्सा नहीं
फ्लोर टेस्ट के बाद राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के सफल रहने से भाजपा की मौजूदा रणनीति और रणनीतिकार दोनों ही विफल रहे हैं। बीते तीन माह से चल रहे सियासी संकट में सांसद भुवन चंद्र खंडूड़ी, सांसद रमेश पोखरियाल निशंक जैसे बड़े चेहरे प्लानिंग का हिस्सा बनते नहीं दिखे।
खंडूड़ी जहां भाजपा के ऐज बैरियर में फिट नहीं बैठ रहे वहीं वह खुद भी सियासी तोड़फोड़ से खुद को अलग किये हुए हैं। निशंक का गढ़वाल में खासे जनाधार का फायदा भी भाजपा इस पूरे प्रकरण में ले नहीं पाई। झारखंड में भाजपा की जीत दिलाने में अहम रहे त्रिवेंद्र सिंह रावत अपने प्रदेश में पैदा हुई सियासी उठक पठक की रणनीति का हिस्सा नहीं दिखे।
दो बरस पहले कांग्रेस को छोड़कर भाजपा में शामिल हुए पूर्व सांसद सतपाल महाराज तक का रणनीतिक लिहाज से इस्तेमाल केंद्रीय लीडरशिप ने नहीं किया है। रणनीतिक लिहाज से भाजपा ने सियासी संकट के दौर में सांसद भगत सिंह कोश्यारी के अनुभवों पर टिका रहा। एक समय तो कांग्रेस को गिराने के बाद कोश्यारी के मुख्यमंत्री बनने की हवा भी खूब चली, लेकिन न तो भाजपा की सरकार बनी न ही राज्यसभा की सीट आई।
उलटा कुमाऊं का एक विधायक ने पद से इस्तीफा दे दिया। गढ़वाल की सीनियर लीडरशिप को विधानसभा चुनाव को लेकर तैयार हो रही रणनीति में मिलने वाली तरजीह तय करेगी कि बतौर संगठन पार्टी कितनी मजबूती से मैदान में उतरेगी। चुनाव की रणनीति में दूसरा सबसे अहम कांग्रेस से भाजपा में आए नए चेहरे हैं, जिसमें पूर्व मंत्री हरक सिंह रावत और पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की भूमिका तय करना आसान नहीं है। पुराने चेहरों को छोड़कर अगर नए चेहरे में असंतुलन बैठाना सबसे अहम रहेगा।