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उत्तराखंड सरकार से नाखुश भगत सिंह कोश्यारी, जब-जब रूठे, तब-तब आया सियासी भूकंप

Sun, 06 Jan 2019 08:33 AM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal राकेश खंडूड़ी, अमर उजाला, देहरादून
राकेश खंडूड़ी, अमर उजाला, देहरादून Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Sun, 06 Jan 2019 08:33 AM IST
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bhagat singh koshyari Unhappy with uttarakhand government
उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी - फोटो : amar ujala

उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री व सांसद भगत सिंह कोश्यारी के बारे में यह चर्चा गरम है कि वे अपनी ही पार्टी की सरकार से नाखुश हैं। हाल ही में केंद्रीय नेताओं की मौजूदगी में हुई बैठक में कोश्यारी के तल्ख तेवर को लेकर सोशल मीडिया पर तमाम खबरें तैर रहीं हैं। उनकी नाराजगी उत्तराखंड की सियासत मेें इस लिहाज से अहम मानी जाती है कि जब-जब वे नाराज हुए सियासी भूकंप आए। 

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- फोटो : अमर उजाला

उनकी नाराजगी को भांपने की कोशिश मेें अमर उजाला संवाददाता ने शुक्रवार को उनसे मजाकिया लहजे में सवाल किया कि इधर कुछ महीनों से उत्तराखंड में दो-चार रिक्टर स्केल वाले भूकंप दर्ज किए जा रहे हैं, क्या ये आपकी नाराजगी का असर है ? इस पर वे बोले, गुस्सा किस पर हूं ? मुझे गुस्सा ही नहीं आता, फिर भूकंप की क्या बात ? उन्होंने जिस लहजे से यह बात कही, वह ऐसा आभास दे गया, मानो कह रहे हों कि बड़े भूकंप में तीव्रता की चर्चा हमेशा तबाही के बाद ही होती है।

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भगत सिंह कोश्यारी - फोटो : Self

कोश्यारी के इस जवाब में क्या निहितार्थ छिपे हैं, ये उनसे बेहतर कोई नहीं जानता। हालांकि सियासी जानकार मानते हैं कि जब-जब कोश्यारी रूठे, तब-तब प्रदेश की भाजपाई सियासत में भूकंप आया।भाजपा की अंतरिम सरकार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी की विदाई से लेकर मेजर जनरल (से.नि.) बीसी खंडूड़ी और डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक की मुख्यमंत्री की कुर्सी खिसकने तक के सियासी भूकंपों के पीछे खांटी सियासतदां कोश्यारी की नाराजगी के किस्से आज भी सियासी बैठकों में बड़े ध्यान से सुने जाते हैं।

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बीसी खंडूड़ी - फोटो : AmarUjala

भाजपा के ही हलकों में आज भी यह कहा जाता है कि वर्ष 2007 में जब भाजपा जादुई आंकड़े के बेहद करीब पहुंची थी, तब इसमें कोश्यारी समर्थक विधायकों का ज्यादा बड़ा योगदान था, इसलिए जब केंद्रीय नेतृत्व ने सत्ता की कमान बीसी खंडूड़ी के हाथों में दी तो ये खेमा अलगाव का शिकार हो गया। अंदर ही अंदर सुलग रहे उनके असंतोष ने करामात दिखाई और दो साल में खंडूड़ी की कुर्सी डोलने लगी। अंतत: उन्हें सत्ता से विदा होना पड़ा।

 

 

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रमेश पोखरियाल निशंक - फोटो : अमरउजाला

हालांकि, उनकी विदाई को लोस चुनाव में पांचों सीटों पर भाजपा की हार से जोड़कर देखा गया, लेकिन जानकार इसमें कोश्यारी और उनके समर्थक विधायकों की नाराजगी को ही कमोवेश जिम्मेदार ठहराते हैं। उस वक्त जाते-जाते खंडूड़ी भी निशंक को अपना उत्तराधिकारी बनाकर सियासी दांव खेल गए।
 

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