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बेटी का हुनर बना पिता की पहचान
अमर उजाला, देहरादून
Updated Mon, 06 Jan 2014 10:32 AM IST
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देहरादून में रहने वाली नेहा ने अपने हुनर से माता-पिता को एक नई पहचान दिलाई है। स्कूल में बेस्ट एथलीट। तीन बार स्टेट बाक्सिंग चैंपियन। नेशनल लेवल पर दो कांस्य और एक रजत पदक।
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उपलब्धियों से भरती गई झोली
नेहा, जहां गई वहां उपलब्धियां अपनी झोली में भरती चली गई। संसाधनों और सुविधाओं के अभाव के बावजूद नेहा ने खेल में जो नाम हासिल किया आज वही उनके पिता की पहचान बन गया है।
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मूलत: गाजियाबाद और दून में शिमला बाईपास रोड निवासी नेहा के पिता नवल किशोर उत्तराखंड परिवहन निगम के मंडलीय प्रबंधक कार्र्यालय में लिपिक हैं। नेहा घर की बड़ी बेटी है, उससे छोटा भाई नितिन है। लेकिन माता-पिता ने कभी बेटा-बेटी में फर्क नहीं समझा।
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नेहा को भी वही सुविधाएं, स्वतंत्रता दी गई जो नितिन को मिलीं। नेहा ने भी माता-पिता के विश्वास को कायम रखा। पढ़ाई-लिखाई में तो वह अव्वल रही ही, खेलकूद में भी कभी पीछे नहीं रही। हिल्टन स्कूल माजरा में पढ़ाई के दौरान लगातार तीन साल तक नेहा ने बेस्ट एथलीट का खिताब हासिल किया।
बाक्सिंग को कॅरियर बनाने की ठानी
स्कूली पढ़ाई के दौरान ही नेहा ने बाक्सिंग को कॅरियर बनाने की ठान ली। पुरुष प्रधान समझे जाने वाले इस खेल में एक छात्रा का जाने का निर्णय संशय वाला हो सकता था, लेकिन परिवार के भरोसे और आत्मविश्वास के बूते नेहा ने यहां भी खुद को बेहतर साबित कर दिखाया।
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प्रैक्टिस के लिए अच्छे ग्लब्स और रिंग शूज न होने के बावजूद नेहा ने राज्य स्तरीय सब जूनियर बाक्सिंग चैंपियनशिप में तीन बार गोल्ड मेडल झटका। यही नहीं, नेशनल चैंपियनशिप में भी दो कांस्य और एक रजत पदक हासिल किया।
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नेहा के पिता नवल किशोर बताते हैं कि नेहा की बदौलत आज उन्हें दफ्तर और समाज में खास सम्मान हासिल हुआ है। लोग अकसर पूछते हैं अरे आपकी ही बेटी ने स्टेट में गोल्ड जीता तो माथा गर्व से ऊंचा हो जाता है।
स्थापना दिवस पर मिला सम्मान
नेहा की मां राजेंद्र देवी बताती हैं कि पिछले राज्य स्थापना दिवस पर बाक्सिंग में प्रदर्शन के आधार पर बेटी को सम्मानित किया गया। नेहा की बदौलत ही वह पूरे प्रदेश के सामने यह सम्मान हासिल कर सकीं। 18 वर्षीय नेहा वर्तमान में डीएवी पीजी कॉलेज में बीएससी प्रथम वर्ष की छात्रा हैं।