बच्चों के ‘स्नेह सदन’ में जानवरों का डेरा
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यूं तो बेसहारा और मानसिक तौर पर बीमार बच्चों को रखने के लिए अनाथ आश्रमों में जगह नहीं है। दूसरी ओर स्नेह सदन जैसे बाल आश्रम में बच्चों की जगह बिस्तरों में कुत्ते, बिल्ली सो रहे हैं।
चाइल्ड हेल्प लाइन के पास आए दिन मानसिक रूप से कमजोर बच्चों के केस आते हैं। उनके पास बच्चों को रखने की समस्या होती है। खंडहर में तब्दील हो रहे स्नेह सदन की किसी ने सुध लेने की कभी कोशिश नहीं की।
देहरादून में टपकेश्वर चौक गढ़ी कैंट स्थित स्नेह सदन का निर्माण छावनी परिषद ने 2010-11 में किया था। मानसिक तौर पर बीमार बच्चों को रखने के लिए इसका निर्माण किया गया था। निर्माण के बाद से अब तक यह खाली है।
न बिजली है और न कोई देखरेख करने वाला
अमर उजाला संवाददाता के सोमवार को यहां पहुंचने पर इसकी जानकारी मिली। हाल में लगे बिस्तरों पर कुत्ते सोए थे। चारों तरफ गंदगी मिली। स्नेह सदन में दो बड़े हॉल हैं। सफाई नहीं होने से गंदगी से भरे कमरे और बिस्तरों से बदबू आ रही थी।
स्थानीय निवासी मधुसूधन शर्मा ने बताया कि निर्माण के बाद से यह इसी हाल में है। कोई भी यहां कभी रहने नहीं आया। यहां न बिजली है और न कोई देखरेख करने वाला।
स्नेह सदन के बाहर भी गंदगी का जमावड़ा लगा हुआ है। यहां राह चलते भिखारियों और जानवरों ने भी अब अपना डेरा डालना शुरू कर दिया है। स्थानीय निवासी देवेंद्र का कहना है कैंट बोर्ड ने कभी इसका संज्ञान नहीं लिया। जिसके चलते स्नेह सदन खंडहर बनता गया।
हमारे पास मानसिक रूप से कमजोर कई बच्चों के केस आते हैं। उस वक्त उनको रखने की सबसे बड़ी चुनौती होती है। साधारण बच्चों को रखने के लिए तो आश्रम हैं, लेकिन मानसिक तौर पर बीमार बच्चों को साधारण बच्चों के साथ नहीं रखा जाता। सरकार भी इस बात पर गंभीरता नहीं दिखा रही है। ऐसे में स्नेह सदन के खाली होने पर भी कोई संज्ञान नहीं लिया जाता। हमारी टीम भी एक बार यहां पहुंची थी लेकिन कोई जानकारी नहीं मिल पाई।
- द्वारिका प्रसाद नौनी, समन्वयक, चाइल्ड हेल्प