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पांच अक्टूबर से परेशानी भुगतने को रहिए तैयार
अमर उजाला, देहरादून
Updated Wed, 25 Sep 2013 08:55 AM IST
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उत्तराखंड सरकार पर कर्मचारियों को दो धड़ों में बांटने का आरोप लगा रहे राज्य कर्मचारी फिर आंदोलन की राह पर हैं।
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फैसला हो चुका हैं कि वेतन विसंगति दूर नहीं की गई तो पांच अक्टूबर से प्रदेश में दो लाख से अधिक कर्मचारी हड़ताल पर चले जाएंगे। संकेत के लिए 27 सितंबर को सचिवालय कूच है और इसके बाद तीन, चार और पांच अक्टूबर को कार्य बहिष्कार है। फिलहाल कर्मचारी गेट मीटिंगों और मंत्रियों से संपर्क साधने में जुटे हुए हैं।
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देखा जाए तो कर्मचारी की इस प्रस्तावित हड़ताल के बीज भी आपदा से पहले हुई मिनिस्ट्रीयल की हड़ताल में ही छुपे हुए हैं। उस समय कर्मचारियों ने 17 सूत्रीय मांग पत्र सरकार के सामने रखा था। सरकार बाद मे हड़ताल तुड़वाने में सफल रही थी, पर दबाव के चलते मिनिस्ट्रीयल को 2800 की जगह 4200 ग्रेड पे दे दिया गया।
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बाकी बचे करीब 1.70 लाख फील्ड कर्मचारियों की शिकायत यह है कि फील्ड कर्मचारी 2800 की ग्रेड पे पर ही रिटायर हो जाएंगे। लिहाजा अब यह कर्मचारी हड़ताल की राह पर है। राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद के अध्यक्ष प्रहलाद सिंह के मुताबिक परिषद करीब डेढ़ माह से शासन से बातचीत करने की कोशिश में है पर अभी तक वार्ता नही हुई।
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परिषद के अधिवेशन में खुद मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा शामिल हुए थे और मांग पत्र पर उन्होंने सकारात्मक कार्यवाही का आश्वासन दिया था। अधिवेशन को भी खासा समय हो चुका है पर अभी तक मांगों पर कोई पहल नहीं हुई। राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद की कोर कमेटी फैसला कर चुकी है कि इस विसंगति को दूर नहीं किया गया तो पांच अक्टूबर से बेमियादी हड़ताल शुरू की जाएगी।
इस बीच सरकार को अपने रुख से अवगत कराने के लिए सचिवालय कूच से लेकर कार्य बहिष्कार तक का कार्यक्रम घोषित किया जा चुका है। मुसीबत यह है कि इस बार हड़ताल की राह पर फील्ड कर्मचारी हैं और इनके हड़ताल पर जाने से विकास और लोगों से सीधा संबंध रखने वाले विभागों का काम प्रभावित होगा। मसलन उद्यान, राजस्व, मनोरंजन, ग्राम्य विकास, पंचायत, शहरी निकाय आदि के कर्मचारी अब आंदोलन में जुटे हुए हैं।
नहीं लिया सबक
सरकार ने लगता है कि मिनिस्ट्रीयल की पहले की हड़ताल से सबक नहीं लिया। हड़ताल के बाद सरकार को दबाव में आना पड़ा और मिनिस्ट्रीयल कर्मचारियों से अंतिम दौर में जाकर बातचीत करनी पड़ी। समाधान भी निकाला गया तो केवल मिनिस्ट्रीयल कर्मचारियों की समस्याओं का।
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बाकी कर्मचारियों की वेतन विसंगति को छुआ तक नहीं गया। इस बार भी फील्ड कर्मचारी पिछले एक माह से आंदोलनरत है पर उनसे बातचीत नहीं की गई है। यही हाल नर्सोँ का भी रहा। हड़ताल पर जाने के बाद ही नर्सों से बातचीत की गई। नो वर्क नो पे का कैबिनेट ने खुद ही फैसला किया और बाद में खुद ही अपने फैसले को पलट दिया।
पहले इसलिए नहीं उठा मामला
परिषद की माने तो मिनिस्ट्रीयल कर्मचारियों की मांग मान लेने के बाद यह विसंगति उभर कर सामने आई। आपदा के कारण कर्मचारियों ने आंदोलन नहीं छेड़ा, पर अब सरकार कह रही है कि राहत और बचाव का काम पूरा हो चुका है तो सरकार के सामने मांग रखी गई। मांग पर सुनवाई न होने के कारण उन्हें हड़ताल का रास्ता अख्तियार करना पड़ रहा है।
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