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'इंद्रासन' उगाना है तो पहले इंद्र सिंह से पूछो

Fri, 17 Oct 2014 04:22 PM IST
आफताब अजमत/ अमर उजाला, देहरादून
आफताब अजमत/ अमर उजाला, देहरादून Updated Fri, 17 Oct 2014 04:22 PM IST
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basmati rice indrasan.

देश में अब कहीं भी बासमती की प्रजाति इंद्रासन व्यवसायिक तौर पर उगानी है तो इसके लिए पंतनगर के पास स्थित इंद्रपुर गांव के किसान इंद्रासन सिंह की अनुमति लेनी होगी।

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जीबी पंत विवि, पंतनगर की सहयोग से इंद्रासन सिंह की यह चावल प्रजाति प्रोटेक्शन ऑफ प्लांट वैराइटीज एंड फॉर्मर्स राइट अथॉरिटी (पीपीएफआरए) में रजिस्टर्ड हो गई है। देशभर से अब तक कुल एक हजार प्रजातियां पंजीकृत हुई हैं, जिसमें तीन और उत्तराखंड की हैं।

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पंतनगर विवि के डिपार्टमेंट ऑफ जेनेटिक्स एंड प्लांट ब्रीडिंग के हेड प्रो. एचएस चावला ने बताया कि उत्तराखंड देश का पहला ऐसा राज्य बन गया है, जिसके किसानों की प्रजातियां उनके नाम से पीपीएफआरए में रजिस्टर हुई हैं।

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इंद्रासन के अलावा एक सोसाइटी के नाम पर हंसराज चावल और दूसरी सोसाइटी के नाम पर तिलकचंदन चावल की प्रजाति पंजीकृत हुई है।

इन्हें पंजीकरण का इंतजार

basmati rice indrasan.

उत्तराखंड की बोक्सा जनजाति का उगाया जाने वाला धनिया राइस, मुनिस्यारी का राजमा और रामपुर के निकट स्थित सारगम का ज्वार भी पंजीकरण के लिए भेजा गया है। वैज्ञानिकों का दावा है कि यह प्रजातियां केवल उत्तराखंड के इन विशेष स्थानों में ही उगाई जा रही हैं।

पंजीकरण से होगा यह फायदा
डॉ. एचएस चावला ने बताया कि प्रजातियां किसानों के नाम से रजिस्टर होने के बाद अब देश में अगर कहीं भी उस प्रजाति की व्यवसायिक मकसद से पैदावार करनी होगी तो इसके लिए अनुमति लेनी होगी।

अब इन लोगों की इच्छा होगी तो इसके लिए वह पैसा भी ले सकते हैं। केंद्र के संरक्षण कानून के मुताबिक अगर किसी ने बिना अनुमति उत्पादन किया तो सख्त कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

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