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नरबलि से शुरू हुई परंपरा जिसने एक गांव को कर दिया मशहूर

Sun, 30 Aug 2015 04:05 PM IST
ब्यरो/अमर उजाला, चंपावत
ब्यरो/अमर उजाला, चंपावत Updated Sun, 30 Aug 2015 04:05 PM IST
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bagwal history start from a human sacrifice.

उत्तराखंड के चंपावत जिले में स्थित छोटे से गांव देवीधुरा की पहचान देशभर में है। इस पहचान की वजह है यहां होने वाली बग्वाल। पाटी विकासखंड के इस छोटे से गांव के नाम से ज्यादा मशहूर यहां की बग्वाल है।

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बलि प्रथा से शुरू यह परंपरा कई दशकों तक पत्थर युद्ध से चलती रही और 2013 से यह सफर फल-फूल तक आ पहुंचा है, मगर बग्वाल का नाम सुनने पर लोगों के जेहन में अब भी सनसनाते पत्थर की याद कौंधती है।
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रविवार को करीब 10 मिनट तक बग्वाल हुई। बग्वाल में फल-फूलों की वर्षा हुई। हां बीचबीच में छिटपुट पत्थर भी उछले। फलों से बग्वाल खेले जाने पर लोगों में उमंग और उत्साह अधिक होने के साथ डर भी जाता रहा। पाटी के संस्कृति कर्मी राजेंद्र गहतोड़ी का कहना है कि अब बग्वाल खेलने और देखने वाले चोट लगने से भयग्रस्त नहीं रहते।

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बलि प्रथा से फल-फूलों तक बग्वाल का सफर

bagwal history start from a human sacrifice.

समय के साथ बग्वाल के बदलते स्वरूप को लोग परंपराओं की खूबसूरती बताते हैं। समाजशास्त्री डॉ. जेपी पाठक का कहना है कि वक्त के साथ बदलाव से परंपरा को ताकत मिलती है। और ये बदले हुए समाज के साथ गतिशीलता को दर्शाती है।

कई सदी पूर्व बग्वाल की शुरुआत से पूर्व नरबलि का रिवाज था। चम्याल खाम की एक बुजुर्ग महिला की मां बाराही देवी की साधना से नरबलि पर विराम लगा। इस बुजुर्ग ने अपने इकलौते बेटे की रक्षा के लिए देवी से प्रार्थना की थी, जिसके बाद बग्वाल के मौजूदा स्वरूप की शुरुआत हुई। मान्यता है कि एक व्यक्ति के बराबर खून निकलने के बाद बग्वाल बंद कर दी जाती है।

चमोली में मशालों से खेली जाती थी बग्वाल
गढ़वाल के चमोली में भी कभी बग्वाल होती थी, मगर इस बग्वाल को खेलने का ढंग यहां से मेल नहीं खाता। नामी इतिहासकार और राजकीय महाविद्यालय के रिटायर्ड प्राचार्य डॉ. मदन चंद्र भट्ट का कहना है कि चमोली के गांवों में बग्वाल मशालों के साथ खेली जाती थी और बग्वाल खेलने के वक्त में भी फर्क था।

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