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विदेशी होकर निभा रहे भारतीय होने का कर्तव्य
अमर उजाला, ऋषिकेश
Updated Mon, 09 Dec 2013 10:52 AM IST
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भगवान श्रीकृष्ण के प्रति गहरी श्रद्धा और भागवत ग्रंथ की प्रेरणा रशिया के आसुत राय को भारत खींच लाई।
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घूम-घूमकर कर रहे श्रीमद्भागवत ग्रंथ का प्रचार-प्रसार
सात समुंदर पार से आए आसुत कई वर्षों से घूम-घूमकर श्रीमद्भागवत ग्रंथ का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। गीतासार से प्रेरित विदेशी साधक ने ठाकुर जी को जीवन समर्पित कर दिया है।
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उनका मानना है कि गीता में जीवन का सार छिपा है, धर्म चाहे कोई भी हो सभी लोगों को इसका अध्ययन करना चाहिए। मूलरूप से रसिया निवासी आसुत राय पांच वर्षों से तीर्थनगरी के अशोका आश्रम, तपोवन में रह रहे हैं।
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उन्होंने बताया कि वह करीब 19 वर्ष पहले भारत आए थे। वाराणसी में रहकर उन्होंने हिंदी और संस्कृत का ज्ञान प्राप्त किया। इसके बाद वृंदावन जाकर स्वामी गोपाल कृष्ण राव से श्रीमद्भागवत की दीक्षा ली।
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कई वर्षों तक श्रीमद्भागवत का अध्ययन करने वाले इस विदेशी साधक ने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र की रणभूमि में अर्जुन को जो उपदेश दिया, वह सार्वभौमिक सत्य है।
बताया कि जो विडंबनाएं रणभूमि में अर्जुन के मन में थी, वही आज मनुष्य के दिलोदिमाग पर हावी हो चुकी हैं। लिहाजा, उन्होंने श्रीमद्भागवत के प्रचार-प्रसार का संकल्प लिया।
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आसुत राय वाराणसी में जनेऊ धारण करने के बाद इस कार्य में जुट गए। वह पांच वर्षों से गांवों, नगरों में जाकर ग्रंथ को लोगों को वितरित कर रहे हैं।
हिंदी, अंग्रेजी भाषाओं में उपलब्ध है ग्रंथ
आसुत राय के पास गीता ग्रंथ की हिंदी और अंग्रेजी अनुवाद पुस्तकें हैं। बताया कि तीर्थनगरी में विभिन्न देशों से आने वाले विदेशियों को भी उन्होंने गीता का रहस्य बताया है, जिससे प्रेरित होकर कई विदेशी गीता का स्मरण कर रहे हैं।