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अमर उजाला संवाद: रोडवेज कर्मचारी बोले, नई बसों के लीवर ही नहीं, डिजाइन में भी बड़ी खामियां

Sat, 30 Nov 2019 10:08 AM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून Published by: अलका त्यागी Updated Sat, 30 Nov 2019 10:08 AM IST
सार

  • न सामान रखने की जगह, न सवारियों को सुविधा, पहली बार ऐसे लीवर देखकर ड्राइवर भी हैरान
  • बसों की लंबाई और लीवर में बगल में बैठी सवारी भी बन सकती है बड़े हादसे की वजह

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Amar ujala samwad in dehradun About New roadways bus
देहरादून में संवाद - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

परिवहन निगम ने जो 150 नई बसें खरीदीं हैं, उनमें केवल लीवर की ही खामी नहीं है बल्कि डिजाइन में भी बड़ी कमियां हैं। अमर उजाला संवाद में पहुंचे ड्राइवरों, कर्मचारियों ने इन बसों के परिचालन से जुड़े अनुभव साझा किए तो यह सभी कमियां खुलकर सामने आईं। 

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टाटा कंपनी से 150 बसों की खेप आई। कुछ दिन चली और तीन लीवर टूटने की घटनाएं होने के बाद रोडवेज ने इन बसों के संचालन पर रोक लगा दी। साथ ही कंपनी का भुगतान भी रोक दिया। फिलहाल बसों की जांच चल रही है।
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इस मुद्दे पर शुक्रवार को अमर उजाला कार्यालय में संवाद कार्यक्रम हुआ। इसमें एक ओर इन बसों को चलाने वाले ड्राइवर शामिल हुए तो दूसरी ओर रोजमर्रा सफर करने वाले यात्री और रोडवेज के आला अधिकारी भी। ड्राइवरों ने इन बसों की डिजाइन से जुड़ी खामियां गिनाईं। 
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बसों में सामान रखने की जगह नहीं
रोडवेज की नई बसों में सामान रखने की जगह ही नहीं बनाई गई। यानी अगर कोई यात्री एक बैग या कुछ और सामान लेकर चलता है तो उसे घुटनों पर रखकर बैठना होगा। क्योंकि बस की गैलरी में भी इतना स्पेस ही नहीं है। इसी तरह पीछे जो यात्री बैठेंगे और उनको उल्टी आती है तो शीशे के ऊपर लोहे का पाइप लगा हुआ है। यानी उल्टी या तो बस में करनी होगी या फिर बस रुकवानी होगी।

बस की बढ़ गई लंबाई
पहाड़ पर वैसे तो छोटी बसें ज्यादा सुरक्षित मानी जाती हैं लेकिन ड्राइवरों ने बताया कि इन बसों की लंबाई साइड मिरर की वजह से और बढ़ गई। दरअसल, इन बसों में साइड मिरर फ्रंट में आगे की ओर लगा दिए गए हैं जो कि कभी भी हादसे का सबब बन सकते हैं।

गियर लीवर के पास बनी सीट खतरनाक

इन बसों में जहां गियर लीवर लगा हुआ है, उसके ठीक बगल में ही एक यात्री के बैठने की सीट लगी हुई है। ड्राइवर कृष्णपाल का कहना है कि इस सीट पर बैठा यात्री अगर अपना पैर इधर रखेगा तो लीवर से टच होकर कभी भी बस न्यूट्रल हो सकती है और चढ़ाई पर बड़ा हादसा हो सकता है। 

बस चलाकर बीमार हो जाएंगे ड्राइवर
नई बस चलाने वाले ड्राइवर प्रेम सिंह रावत का कहना है कि यह बसें किसी भी ड्राइवर को बीमार कर सकती हैं। उनका कहना है कि उन्होंने पहली बार ऐसे गियर लीवर देखे हैं। यह इतने पीछे हैं कि बस चलाने वाले का कंधा दर्द करने लगता है। उस पर अगर कोई ड्राइवर छोटे कद का होगा तो उसे गियर बदलने को पीछे मुड़ना पड़ेगा, जिससे हादसा भी हो सकता है।

केंद्र के बीक्यूसी मानकों में नहीं रखा गया पहाड़ का ख्याल
अमर उजाला संवाद के दौरान यह बात सामने आई कि बसों की सीटों को लेकर नियामक संस्था एआरआई को पर्वतीय इलाकों में संचालित बसों के मानकों में बदलाव करना चाहिए। महाप्रबंधक तकनीकी दीपक जैन ने कहा कि वर्तमान में मैदानी व पर्वतीय इलाकों के लिए बस क्वालिटी कोड यानी बीक्यूसी के मानक एक जैसे हैं। यही वजह है कि पहाड़ों में बसों में गीयर लीवर आए दिन टूट रहे हैं। जो किसी भी दिन बड़े हादसे का सबब बन सकते हैं।

गाड़ियों की खरीद में रोडवेज में फिर दोहरायी बड़ी गलती

परिवहन निगम की नई बसों के गीयर लीवर टूटने पर गाड़ियों की खरीद को लेकर ही सवाल खड़े होने लगे हैं। अमर उजाला संवाद में लोगों ने गाड़ियों के माडल को लेकर ही विभागीय अधिकारियों को कटघरे में खड़ा कर दिया। आरोप लगाया कि परिवहन निगम अधिकारियों ने वही गलती दोहरा दी, जो उन्होंने साल 2015 में की थी।

देहरादून महानगर सिटी बस सेवा महासंघ के अध्यक्ष विजयवर्धन डंडरियाल ने बस के माडल पर ही सवाल उठाते हुुए कहा कि परिवहन निगम ने साल 2015 में बीएस- 3 मॉडल की गाड़ियां खरीदी, जबकि बीएस- 4 मॉडल की गाड़ियां बाजार में आ गईं थीं। बीएस-3 मॉडल की गाड़ियों के पंजीकरण पर रोक लगा दी गई थी।

अब जबकि एक अप्रैल 2020 के बाद सिर्फ बीएस- 6 माडल की गाड़ियों का पंजीकरण होगा, तो अधिकारियों ने आनन फानन में बीएस- 4 माडल की गाड़ियों की खरीद कर डाली। यह अधिकारियों की मंशा पर कई सवाल खड़े करता है। साफ आरोप लगाया कि अधिकारियों ने कंपनी अधिकारियों से साठगांठ करके बीएस-4 गाड़ियां खरीदीं।

इतना ही नहीं विजयवर्धन डंडरियाल ने कहा कि इन गाड़ियों को एक अप्रैल के बाद यदि खरीदा जाता तो न सिर्फ अत्याधुनिक बीएस- 6 मॉडल की गाड़ियां परिवहन निगम के बेड़े में शामिल होंती, वरन प्रदूषण के मानकों पर भी ये गाड़ियां खरी उतरतीं।

बता दें कि कई विभागीय अधिकारी, कर्मचारी भी बीएस-4 मॉडल की गाड़ियों की खरीद को लेकर दबी जुबान में सवाल उठा रहे हैं। इन अधिकारियाें का मानना है कि कंपनी ने सौदेबाजी में हेराफेरी करके पुराने मॉडल के गीयर लीवर वाली गाड़ियां भेज दी, जिसे किसी भी सूरत में सही नहीं ठहराया जा सकता है।

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