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Samvad: धारणा बदलने के लिए खेलों से बड़ा कोई माध्यम नहीं, डॉ. दीपा बोलीं-दिव्यांग होने के बाद जिद थी कि...

Mon, 05 Aug 2024 09:17 AM IST
शाहरुख खान अमर उजाला नेटवर्क, देहरादून
अमर उजाला नेटवर्क, देहरादून Published by: शाहरुख खान Updated Mon, 05 Aug 2024 09:17 AM IST
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Amar Ujala Samvad Paralympic medalist Dr. Deepa Malik says no better medium than sports to change perception
Amar Ujala Samvad - फोटो : अमर उजाला
अमर उजाला संवाद में पैरालंपिक पदक विजेता डॉ. दीपा मलिक ने अपने अनुभवों से जोश भरा। कहा, दिव्यांग होने के बाद जिद थी, देश के लिए कुछ करना है। उससे भी ज्यादा जिम्मेदारी थी दिव्यांगता के प्रति लोगों की मानसिकता को बदलना।
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कहा, लोगों की धारणा को बदलने के लिए खेलों से बड़ा कोई माध्यम नहीं है। डॉ. दीपा ने बताया, दिव्यांग होने के बाद 36 साल की उम्र में उन्होंने खेलना शुरू किया। हालांकि, खेल के लिए अपने शरीर को तैयार करने के लिए लंबा वक्त लगा और 12 सालों की तपस्या के बाद देश के लिए पहला मेडल जीता। 
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कहा, 20 साल तक बीमारी से गुजरने के बाद भी लोगों की मानसिकता नहीं बदल सकी। लेकिन, जब देश के लिए मेडल जीता तो कल तक जिस शरीर को लोग दिव्यांग बता रहे थे, आज वहीं मुझे देख गौरवान्वित होते हैं। 
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जिंदगी का पहला गोल्ड मेडल था एक पैसा : मुरलीकांत पेटकर
देश को साल 1972 में 50 मीटर फ्रीस्टाइल तैराकी में पहला पैरालंपिक स्वर्ण पदक दिलाने वाले पद्मश्री मुरलीकांत पेटकर ने कहा, जिंदगी का पहला गोल्ड मेडल वह था, जब उन्होंने अपने गांव में कुश्ती मुकाबले में एक पैसे का सिक्का जीता था। 

सेना के इलेक्ट्रॉनिक्स और मैकेनिकल इंजीनियर्स (ईएमई) कोर में क्राफ्ट्समैन के पद पर रहे मुरलीकांत ने बताया कि 1965 में भारत-पाक के बीच हुई जंग में उनको नौ गोलियां लगीं और एक गोली उनकी रीढ़ की हड्डी में आज भी है। इसके चलते वह घुटने से नीचे पैरालाइज हो गए। करीब एक साल तक कोमा में रहने के बाद दो साल तक बिस्तर पर रहे, लेकिन हार नहीं मानी और ठीक होने के बाद कुश्ती और बॉक्सिंग में हाथ आजमाया।

मां के गहने बेचकर खेला, सोना जीतकर चुकाई कीमत : देवेंद्र झाझरिया
भाला फेंक में विश्व में देश का परचम लहराने वाले भारतीय पैरालंपिक खिलाड़ी पद्मश्री से सम्मानित देवेंद्र झाझरिया को आज भी वह किस्सा दर्द देता है, जब वह मां के गहने बेचकर साल 2004 में एथेंस ओलंपिक में खेलने गए थे। देवेंद्र झाझरिया ने नौ वर्ष की उम्र में अपना एक हाथ गंवा दिया था।

उन्होंने बताया, साल 2004 में एथेंस ओलंपिक में देश का प्रतिनिधित्व करने के लिए पहले सिस्टम से लड़ाई लड़ी। लेकिन सरकार से आर्थिक मदद न मिलने के बाद पिता ने मां के गहने बेचकर एक लाख रुपये चुकाए और देवेंद्र ने देश के लिए गोल्ड जीता। उन्होंने कहा, देश के लिए पदक जीतने की खुशी शब्दों में बयां नहीं की जा सकती।
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