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मदद की नमी से सूखे खेतों में लहलहाई फसल
शैलेंद्र पांडेय/ अमर उजाला, चेपड़ों (थराली)
Updated Sun, 01 Jun 2014 03:58 PM IST
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नरेंद्र सिंह और सुरेंद्र सिंह का पुश्तैनी घर पहाड़ पर था। बाजार से दूरी करीब चार किलोमीटर। बच्चों को स्कूल जाने के लिए रोज आठ किलोमीटर पैदल चलना पड़ता।
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पहाड़ पर जाने के लिए मजबूर
बच्चों की बेहतर पढ़ाई के लिए दोनों भाइयों ने चेपड़ों बाजार में एक छोटा सा घर बना लिया पर पिछले साल आई आपदा ने उन्हें फिर पहाड़ पर जाने के लिए मजबूर कर दिया।
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चमोली जिले के थराली में रहने वाले नरेंद्र सिंह खेतीबाड़ी करते हैं। उनके भाई सुरेंद्र होमगार्ड हैं। सरकारी सेवा में होने के बावजूद इस परिवार को सरकार से कोई मदद नहीं मिली।
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नरेंद्र बताते हैं कि पिछले साल 16 जून की रात जबरदस्त बारिश हुई। पिण्डर नदी बहुत बढ़ गयी थी पर अंदाजा नहीं था कि पानी इस कदर तबाही मचाएगा।
सुबह सात बजे जब घर के नीचे की मिट्टी कटने लगी तब खतरे का आभास हुआ। हालांकि इसके बाद भी वह घर का कोई सामान नहीं बचा पाए।
इस परिवार को सरकार ने जमीन दी थी पर उसका पट्टा नहीं हुआ था। इस कारण पीड़ित होने के बावजूद उन्हें मुआवजा नहीं मिला।
सारी जमा पूंजी गवांने के बाद सुरेंद्र, नरेंद्र के पास ऐसा कोई जरिया नहीं था कि वह दोबारा बाजार में बस सकें। उन्हें फिर मछखेत गांव स्थित अपने पुराने घर में जाना पड़ा।
अमर उजाला फाउंडेशन की मदद
यह घर भी जर्जर स्थिति में था। दोनों भाइयों की एक बड़ी चिंता खुद को फिर से स्थापित करने की थी। अमर उजाला फाउंडेशन ने इसमें उनकी मदद की।
स्थानीय एनजीओ हरियाली के सहयोग से दोनों भाइयों के लिए अस्थायी आवास बनाए गए हैं। उन्होंने इसमें रहना भी शुरू कर दिया है।
आश्रय के पास स्थित जो खेत एक साल पहले तक सूखे थे, उनमें लहलहाती गेहूं की फसल बताती है कि नाउम्मीदी के बादल अब छंटने लगे हैं।
मैंने ऐसा दृश्य कभी नहीं देखा। नदी में डंपर, गाड़ियां और घर बह रहे थे। तीन दिन लगातार बारिश होती रही। हम पर कुदरत का कहर बरपा।
- नरेंद्र सिंह, मछखेत, चेपड़ों