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अलकनंदा-मंदाकिनी घाटी में खिसक रहे जंगल

Fri, 26 Jul 2013 08:14 AM IST
संदीप थपलियाल
संदीप थपलियाल Updated Fri, 26 Jul 2013 08:14 AM IST
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Alaknanda-Mandakini valley forest eroding

तेज मूसलाधार बारिश। दरकती पहाड़ी। जमीन के अंदर से निकलता पानी। पहाड़ी पर बसे गांव और जंगल। सबसे नीचे नदी। यह स्थिति है पहाड़ की। पहाड़ियों के लगातार नीचे खिसकने से कई खतरे उत्पन्न हो गए हैं।

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गांव तो बर्बाद हो ही रहे हैं। साथ ही पेड़ और बोल्डर सहित पहाड़ी के नदी में आने से नदी का प्रवाह रुकने या मुड़ने की आशंका है।

पहाड़ में आई जल प्रलय में केदारघाटी, कालीमठ घाटी, मद्महेश्वर घाटी, अलकनंदा घाटी और पिंडर घाटी के लोगों ने नदियों की तेज प्रवाह और धारा मुड़ने का नुकसान झेला है। यदि पानी के साथ मिट्टी, बोल्डर और पेड़ नहीं आते, तो लोगों के आशियाने और पुल नहीं बहते।
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बढ़ता जा रहा है खतरा
खतरा अभी टला नहीं है। बल्कि बढ़ता जा रहा है। रुद्रप्रयाग में सुमाड़ी, चाका, चंद्रापुरी, चमराड़ा, हाट, पाली, गिंवाला, टेमरिया, बीरों, डमार, नैली कुंड, कालीमठ, ह्यूण के नीचे, कुणजेठी, कविल्ठा, नाला, पाली फाफंज व भेतसेम का जंगल और चमोली में हेलंग, थराली, नारायणबगड़, स्यान, ध्याड़ी, छपाली, त्यूला व कमेड़ा सहित दर्जनों क्षेत्र हैं, जहां पहाड़ी धंस रही हैं।


समस्या यह है कि इनमें अधिकांश ऐसे क्षेत्र हैं, जहां ऊपर गांव बसे हुए हैं और नीचे नदी बह रही है। वीरों निवासी कार्तिक सिंह और केदार बताते हैं कि उनके गांव के नीचे लगातार भूस्खलन हो रहा है। यह मलबा मंदाकिनी नदी में जा रहा है।

ये हैं  खतरे
कुछ देर रुक सकता है नदी का जलप्रवाह।
एकाएक मलबा हटने से निचले स्थानों में नुकसान की आशंका।
मलबा गिरने से नदी की धारा अपना रुख बदलेगी।
मलबे के कारण नदियों का जलस्तर और ऊपर आ जाएगा।

सरकार को देरी नहीं करनी चाहिए। संवेदनशील स्थानों को तत्काल चिह्नित करना होगा। नदी के कटाव और भूस्खलन से बचाव कैसे हो इसके लिए वैज्ञानिकों की मदद ली जानी चाहिए।
-डा. डीएस कोटलिया, भूगर्भ विज्ञान विभाग, कुमाऊं विश्वविद्यालय

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