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मोदी के मंत्रिमंडल में उत्तराखंड खाली हाथ

Mon, 10 Nov 2014 08:10 AM IST
दीप जोशी/अमर उजाला, अल्मोड़ा
दीप जोशी/अमर उजाला, अल्मोड़ा Updated Mon, 10 Nov 2014 08:10 AM IST
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ajay tamta may be part of pm cabinet.

केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल नेताओं में इस बार भी उत्तराखंड के नेता को जगह नहीं मिली। इससे प्रदेश के भाजपा कार्यकर्ता और जनता में बेहद रोष है।

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लोकसभा चुनाव में पांचों सीट भाजपा के नाम करने वाली उत्तराखंड की जनता खुद हो ठगा सा महसूस कर रही है। इससे पहले शनिवार को अल्मोड़ा के सांसद अजय टम्टा को उत्तराखंड से केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह मिलने की संभावना जताई जा रही थीं।
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खबरें थी कि उत्तराखंड के सांसदों में सबसे युवा होने के साथ ही बेदाग छवि और अनुसूचित जाति वर्ग से होने का लाभ उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल होकर मिलेगा। राज्य से सांसद बने तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों की आपसी फूट से उनका नाम उछला।
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दिल्ली से अजय टम्टा को मंत्री बनाने के संकेत मिलने के बाद टम्टा शनिवार को दिल्ली रवाना हो गए थे। लेकिन उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली।

आपसी गुटबाजी के कारण बिगड़ा खेल

ajay tamta may be part of pm cabinet.

उत्तराखंड से सांसद चुनकर गए तीन पूर्व मुख्यमंत्री मेजर जनरल बीसी खंडूड़ी, भगत सिंह कोश्यारी और डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक मंत्री पद की दौड़ में शामिल माने जा रहे थे।

सूत्रों के अनुसार पार्टी हाईकमान ने उम्रदराज होने के कारण बीसी खंडूड़ी और भगत सिंह कोश्यारी को मंत्री पद की दौड़ से बाहर किया।

बताया गया है कि तीसरे पूर्व सीएम डा. रमेश पोखरियाल निशंक के अलावा महारानी राज्यलक्ष्मी और राज्यसभा सदस्य तरुण विजय के नामों पर भी आम सहमति नहीं हो पाई।

बताया जा रहा है कि पूर्व मुख्यमंत्रियों की आपसी गुटबाजी के कारण अजय टम्टा का नाम उछला और अधिकांश नेता किसी पूर्व सीएम को मंत्री बनाने के बजाय उनके नाम पर सहमत हो गए थे। बता दें ‌‌कि सांसद टम्टा की आरएसएस लॉबी के साथ भी अच्छी पकड़ है।

सांसद अजय टम्टा का प्रोफाइल

ajay tamta may be part of pm cabinet.

जन्मतिथि : 16 जून,1972
शिक्षा: इंटरमीडिएट
- 1997 में जिला पंचायत सदस्य चुने गए
- 2002 में सोमेश्वर विस सीट से निर्दलीय लड़े और हारे
- 2007 में सोमेश्वर से भाजपा विधायक बने, गृह, समाज कल्याण विभाग में राज्यमंत्री बने
- 2008 में बीसी खंडूड़ी मंत्रिमंडल में दर्जाधारी कैबिनेट मंत्री बने
- 2009 में लोस चुनाव में अल्मोड़ा सुरक्षित सीट से हारे
- 2012 में सोमेश्वर से दोबारा विधायक बने
- 2014 में अल्मोड़ा सीट से सांसद चुने गए
- भाजपा में राष्ट्रीय कार्यकारिणी और राष्ट्रीय परिषद के सदस्य रहे
- भाजपा अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष भी रहे

भाजपा में तीन तिगाड़ा, काम बिगाड़ा

ajay tamta may be part of pm cabinet.

अनूप वाजपेयी/ देहरादून

तीन तिगाड़ा, काम बिगाड़ा की कहावत उत्तराखंड भाजपा की राजनीति पर फिट बैठती है। प्रदेश भाजपा मोटे तौर पर तीन गुटों में बंटी हैं और प्रत्येक गुट का मुखिया पूर्व मुख्यमंत्री है।

भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने अब समझ लिया है कि उत्तराखंड भाजपा में इन्हीं गुटों की वजह से ही काम बिगड़ रहा है। गुटबाजी का टंटा कटाने के लिए ही भाजपा में उत्तराखंड में सबसे कम वोट से जीतने वाले अल्मोड़ा के सांसद अजय टम्टा का नाम सामने आया।

लो प्रोफाइल अजय टम्टा पर किसी गुट विशेष की छाप नहीं लगी है। वहीं सीएम हरीश रावत की राजनैतिक जमीन पर फसल खड़ी करने की कवायद है।

प्रदेश भाजपा के जमीनी कार्यकर्ता से लेकर ऊपर पदाधिकारियों, विधायकों की पहचान पार्टी नेता से अधिक उनके गुटीय मुखियाओं भुवन चंद्र खंडूड़ी, रमेश पोखरियाल निशंक और भगत सिंह कोश्यारी के करीबी के रूप में होती है।

लाख कोशिशों के बाद भी आलाकमान न तो गुटबाजी और न ही पार्टी को हो रहे नुकसान पर काबू पा सका है। केंद्रीय नेतृत्व खंडूड़ी है जरूरी का नारा देकर प्रदेश में चुनावी तानाबाना बुनता है लेकिन खंडूड़ी ही चुनाव हार जाते हैं।

भाजपा की नींव में गुटबाजी का पत्थर

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राज्य स्थापना दिवस के मौके पर शायद केंद्रीय नेतृत्व भी हिसाब-किताब ठीक करना चाहता है और कार्यकर्ताओं को इस मैसेज के साथ कि अकेला चलकर भी कुछ पाया जा सकता है।

उत्तराखंड भाजपा की नींव में ही गुटबाजी का पत्थर पड़ गया था। केंद्रीय नेतृत्व ने पहले सीएम के तौर पर बची सिंह रावत को भेजा लेकिन नित्यानंद अंतरिम सीएम बने।

आठ महीने में जबरदस्त गुटबाजी के बाद भगत सिंह कोशियारी ने उनकी कुर्सी छीन ली। पार्टी ने पहला चुनाव उनके नेतृत्व में लड़ा लेकिन सरकर कांग्रेस की बन गई।

बताते हैं अपनों को टिकट बंटाने और दूसरे गुटों के अलग राग अलापने से पार्टी पराजित हुई। भाजपा राज्य में जीती थी लेकिन कुछ दिन खंडूड़ी और कुछ दिन निशंक के खेल में पार्टी और कमजोर हुई।

हाल के तीन उपचुनाव में पार्टी ने अपने गढ़ गवां दिए। पार्टी की हार का कारण यहां गुटबाजी रहा। एक गुट ने हरवाने का आरोप लगाया तो दूसरे ने कमजोर उम्मीदवारी की बात कह पल्ला झाड़ लिया।

मोदी लहर में लोकसभा चुनाव में लाखों वोट से जीतने वाले सांसद अपने क्षेत्रों में पंचायत चुनाव भी नहीं जिता सके। इसे देखत हुए पार्टी ने प्रदेश में नई इबारत लिखने का फैसला किया है।

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