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एजेंडा पहाड़: बड़ी चुनौती, वन्य जीवों से कैसे बचे पहाड़ में खेती 

Mon, 22 Jul 2019 10:28 AM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal सुधाकर भट्ट , अमर उजाला, देहरादून
सुधाकर भट्ट , अमर उजाला, देहरादून Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Mon, 22 Jul 2019 10:28 AM IST
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agenda pahad crop How to survive in wild animals
- फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो

हिमालयन कान्क्लेव में 28 जुलाई को ग्यारह पर्वतीय राज्यों के मुख्यमंत्री अपने राज्यों के सरोकार और चुनौतियों पर मंथन करेंगे। अमर उजाला इस कान्क्लेव से पहले ‘एजेंडा पहाड़’ नाम से हिमालयी राज्यों की सात बड़ी चुनौतियों पर खबरों की सीरीज प्रकाशित कर रहा है। पहली चुनौती है फसलों को वन्य जीवों से बचाना। जंगली सुअरों, हाथियों, नील गाय और बंदरों की समस्या से बड़े पैमाने पर किसान खेतीबाड़ी छोड़ने के मजबूर हो रहा है। हिमालय कॉन्क्लेव में राज्यों के सामने इस हिमालय सरीखी समस्या से पार पाने की चुनौती होगी...

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पर्यावरण की सुरक्षा से इतर मसूरी में 28 जुलाई को ग्यारह राज्यों के मुख्यमंत्रियों को अपने-अपने राज्यों की फसलों को वन्य जीवों से बचाने के लिए भी जूझना होगा। ये एक ऐसी समस्या है। जिससे सिक्किम से लेकर उत्तराखंड तक जूझ रहा है। ऐसे में जहां सिक्किम का जैविक राज्य होने का स्टेटस खतरे में हैं। वहीं उत्तराखंड में करीब 30 प्रतिशत फसलें खेतों में ही बर्बाद हो रही हैं। प्रदेश के कृषि मंत्री को कहना पड़ रहा है कि ऐसी खेती करें जिसकी ओर वन्य जीव आए हीं नहीं। लोग भी अपनी तरफ से कोशिश कर रहे हैं पर स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है।
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प्रदेश में वन्य जीव विहार, अभ्यारण्य, नेशनल पार्क आदि के किनारे के गांवों में वन्य जीवों से फसलों के नष्ट करने की समस्या अधिक है। हर साल जंगल से निकल कर आबादी की ओर आने वाले वन्य जीवों की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है। पर्वतीय जिलों में बंदरों और जंगली सुअरों का प्रकोप अधिक है। मैदानी क्षेत्रों में हाथियों और नील गायों ने फसलों पर धावा बोला हुआ है। हाल ये है कि प्रदेश में करीब 30 प्रतिशत फसल जंगली जानवरों की भेंट चढ़ रही है। नाबार्ड के एक अध्ययन के मुताबिक उत्तराखंड में पोस्ट हार्वेस्ट हानि करीब 40 प्रतिशत है। साफ है कि फसल खेत से लेकर मंडियों तक पहुंचने में नुकसान उठा रही है और इसी सीधी चोट किसान पर है। 
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खुद वन विभाग यह मान रहा है कि मानव वन्यजीव संघर्ष की एक बड़ी वजह यह क्रॉप रेडिंग भी बन रही है। खासकर जंगल के किनारे के गांवों में यह समस्या अधिक है। तेंदुओं का आबादी की ओर रुख करने का नतीजा है कि गांव के लोग दूर दराज के खेतों को बंजर छोड़ रहे हैं। घर के पास की क्यारी को बंदर पनपने नहीं दे रहे हैं। गेहूं और धान के खेतों को नील गाय उजाड़ बना रहीं हैं। यह पटकथा सिर्फ उत्तराखंड में नहीं लिखी जा रही है। बल्कि सभी हिमालयी राज्य इस समस्या से पीड़ित हैं। सिक्किम जैसे राज्य के 25 प्रतिशत किसान जैविक सब्जी उत्पादन छोड़कर चाय की खेती पर उतर आए। उत्तराखंड भी प्रदेश को जैविक प्रदेश बनाना चाह रहा है और इसकी राह में इसी तरह की समस्या आ रही है। खुद कृषि मंत्रालय किसानोें को जड़ी बूटी उत्पादन की सलाह दे रहा है। परंपरागत खेती चौपट होती जा रही है। पलायन आयोग भी मान रहा है कि खेती का नुकसान बढ़ जाने से लोग खेती छोड़ रहे हैं।  

फसलों को वन्य जीवों से बचाने के लिए हम प्रदेश में किसानों को सगंध, जड़ी बूटी आदि की खेती के लिए भी प्रेरित कर रहे हैैं। किसानों को इस बात के लिए भी मनाया जा रहा है कि वे फसल को बचाने में अपने धार्मिक दृष्टिकोण को किनारे रखें। जंगली सुअरों और नील गायों को मारने की अनुमति दी गई है। जुलाई में ही दिल्ली में कृषि मंत्रियों के सम्मेलन में मैंने खेती को वन्य जीवों से बचाने का मुद्दा उठाया था। अब हिमालयन कॉन्क्लेव में भी हम इस मुद्दे को पुरजोर तरीके से उठाने की कोशिश में हैं।
- सुबोध उनियाल, कृषि मंत्री 

उत्तराखंड...
कुल भूभाग ...5348 
कुल जंगल...3800  (63.42 प्रतिशत)
सकल बुवाई क्षेत्र ....701
(सभी आंकड़े हजार हेक्टेयर में , आईएसएफआर 2017)
 

....ताकि बचे रहें खेत

फसल को बचाने में किसान नहीं छोड़ रहे कोई कसर, साड़ियों से लेकर गानों तक को अजमाया
ऐसा नहीं है कि किसानों की ओर से फसलों को बचाने की कोई कोशिश नहीं हो रही है। वन्य जीवों से फसल बचाने की हर संभव कोशिश फिलहाल किसान करते नजर आ रहे हैं। मुसीबत ये है कि इनको पूरा सहयोग नहीं मिल पा रहा है और मौसम में बदलाव के कारण यह समस्या अब और विकट होती जा रही है। कहीं बंदर रजिस्टर बनाए गए तो कहीं हनी सिंह के गाने बजाए गए। कहीं खेतों के चारों ओर साड़ियों को लगाया गया, तो कहीं लोगों ने सामूहिक रूप से खेतों की चौकीदारी का बीड़ा उठाया। इतना सब कुछ करने के बाद भी लोगों को कोई स्थायी हल नहीं मिल पाया है। 

सोमेश्वर घाटी में बंदर रजिस्टर
कुमाऊं की सोमेश्वर घाटी के कुछ गांवों ने बंदरों से फसलों को बचाने के लिए गांव के स्तर पर रोस्टर तय किया गया। इनकी ओर से प्रत्येक दिन के लिए अलग-अलग पांच परिवारों की ड्यूटी लगाई गई। पांच से सात महिलाओं का यह समूह लोहे के कंटरों को पीट कर और अन्य तरीकों से बंदरों को खेतों से दूर रखने का काम करता है। लेकिन यहां मुख्य चुनौती आलू, गडेरी आदि को जंगली सुअरों से बचाने की है। ये जंगली सुअर रात को आते हैं और पूरा खेत खोद डालते हैं। 

हाथियों से बचने को एनाइडर
जंगली हाथियों से फसल को बचाने के लिए वन विभाग ने हल्द्वानी के जीतपुर क्षेत्र के गांवों में यह प्रयोग किया था। इसमें एनीमल डिटेक्श्न एंड रिपेलेंट सिस्टम को विकसित किया गया। दिल्ली के एक युवा छात्र ने इस तकनीक का पहले एक गांव में प्रयोग किया था। एनाइडर में लगा सेंसर कुछ मीटर की दूरी पर ही वन्य जीव की उपस्थिति का एहसास कर लेता है और उसके बाद जोर से साइरन बजाता है। अचानक हुई सायरन की आवाज से जानवर डर कर दूर हो जाता है। वन विभाग से मिली जानकारी के मुताबिक हाथियों के मामले में यह तकनीक सफल हुई है लेकिन बंदर इससे खेलने लगते हैं। फिर भी यह तकनीक व्यापक स्तर पर अपनाई नहीं गई।

खेतों में हनी सिंह के गाने
भवाली के एक गांव में यह प्रयोग किया गया। गांव में खेतों पर डैक लगाकर गाने बजाए गए। यह पाया गया कि खेतों से बंदर कुछ समय तक दूर रहे। लेकिन यह प्रयोग व्यवहारिक साबित नहीं हुआ। यह पाया गया कि हर जगह इस तरह से गाने नहीं बजाए जा सकते। 

खेतों में रंग बिरंगी साड़ियों की फैं सिंग
पर्वतीय जिलों की ओर निकलने वालों को अक्सर ऐसे खेत दिखाई देंगे जो रंग बिरंगी साड़ियों से घिरे हुए हों। यह प्रयोग एक तरह से बंदरों के बजरबट्टूू की तरह का है। लोगाें के मुताबिक कुछ हद तक इससे बंदरों की समस्या सुलझी। लेकिन जंगली सुअर, नील गाय आदि की समस्या जस की तस रही। 

लोगों को पैसे मिलते तो कुछ होता
- मैने प्रदेश सरकार से कहा था कि विधायक निधि का उपयोग वन्य जीवों से फसलों को बचाने के लिए हो रहे प्रयोगों पर खर्च करने की अनुमति दी जाए। अल्मोड़ा में ताकुला गांव का एक किसान है कुंदन। उसने कुछ पैसे जुटा कर आलू के खेत के चारों ओर टिन की बाड़ की। पहली ही फसल में उसे लागत वापस मिल गई। इसी तरह कई अन्य जगह प्रयोग हुए। 70 विधायक 70 विधानसभाओं में इस तरह के प्रयोगों को फाइनेंस करते तो कुछ बात बनती। हैस्को ने एक फलदार जंगल विकसित किया। फायदा यह हुआ कि मानव वन्यजीव संघर्ष कम हुआ। जंगली जानवरों के प्रकोप से लोग मायूस हैं।
- अनिल जोशी, संस्थापक निदेशक, हैस्को

सरकार की ओर से हो रही कोशिश 

- जहां संभव हो वहां बांस सहित अन्य कंटीली झाड़ियों की फैंसिंग की जाए
- सोलर फैंसिंग
- कृषि विभाग की ओर से कुछ खास क्षेत्रों में पांच फिट की दीवार और इसके ऊपर कंटीली तारबाड़ का भी प्रयोग किया गया। पहाड़ मेें बिखरे खेते होने के कारण यह प्रयोग अधिक किसानों ने नहीं अपनाया।
- पॉलीहाउस के जरिए नियंत्रित स्थिति की खेती। प्रगतिशील किसान इस तरीके को अपना रहे हैं।
- ऐसी फसलों की खेती जिसकी ओर जंगली जानवर आकृष्ट न हों

...ये भी है एक तरीका 
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में वन्य जीवों से फसल नुकसान का मुआवजा दिया जाए। कृषि मंत्री सुबोध उनियाल के मुताबिक केंद्र से यह मांग की जा चुकी है। यह होता है तो किसान कम से कम खेती करना नहीं छोड़ेंगे। 

अल्मोड़ा जिले का महत गांव 
वन्य जीव         नुकसान
जंगली सुअर    70 प्रतिशत 
बंदर                2.61 प्रतिशत
हिरन             44.70  प्रतिशत
साही            2.61 
चूहा            7.89
खरगोश         3.30

गांव के लोगों ने जंगली जानवरों से फसल को बचाने के लिए रोस्टर बनाया हुआ है। सभी बारी-बारी से पहरा देते हैं। इतने पर भी नुकसान कम नहीं हो रहा है। लोग मायूस हैं, क्या करें।
- प्रवीण मेहता, महत गांव प्रधान

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