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जलप्रलय के बाद घट रहा है भूगर्भ जल स्तर
रजा शास्त्री
Updated Sat, 20 Jul 2013 08:56 AM IST
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जल प्रलय ने भले ही हर जगह पानी-पानी कर दिया हो लेकिन पहाड़ों के अंदर ‘प्यास’ बढ़ रही है। पहाड़ों से सारा पानी नीचे चले आने से यहां का भू-गर्भ जलस्तर गिर रहा है। इससे झरने और दूसरे जल स्रोत सूखने का खतरा पैदा हो गया है। झरने पहाड़ों पर पीने के पानी का सबसे बड़ा स्रोत हैं।
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केंद्रीय मृदा एवं जल संरक्षण अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान ने उत्तराखंड सरकार को पानी के संरक्षण के लिए चेकडेम विधि सुझाई है। पहाड़ी नालों पर चेकडेम बनाकर पानी में सिंझाया (जज्ब कराया) जाएगा। इससे भूगर्भ जलस्तर रिचार्ज होगा और सुरक्षित रहेगा। संस्थान ने इस विधि का कई स्थानों पर सफल प्रयोग कर चुका है।
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संस्थान के वरिष्ठ जल विज्ञानी डा. डीपी जुयाल ने बताया कि विभिन्न सर्वेक्षणों की रिपोर्ट में अंदेशा जाहिर किया जा रहा है कि अगर जलस्रोत रिचार्ज न हुए तो भूगर्भ जल का पहला स्तर कुछ सालों में सूख सकता है। इसका असर बारहों मास बहने वाले झरनों और पहाड़ों पर पीने के पानी के दूसरे स्रोतों पर पड़ेगा।
वनस्पतियों का अस्तित्व भी खतरे में
इससे पहाड़ी क्षेत्रों की वनस्पतियों का अस्तित्व भी खतरे में पड़ सकता है। सर्वेक्षणों की रिपोर्ट में पहाड़ी क्षेत्रों के जलस्रोतों पर खतरे का मुख्य कारण पेड़ों की कटान, आबादी बढ़ना, पहाड़ों की संरचना से छेड़छाड़ आदि बताया जा रहा है। झाड़ियों और पेड़ों के होने से पानी जमीन में जज्ब होता है जिससे भूगर्भ जलस्तर रिचार्ज होता रहता है। डा. जुयाल ने बताया कि पहाड़ों पर जलस्रोतों के घटने को लेकर अलग-अलग कई सर्वे हो चुके हैं।
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