आग से दहक रहे उत्तराखंड में अब आएगा जल संकट!
- वनों की आग से भूजल के स्तर में गिरावट आने की आशंका
- वनस्पतियां जलने और दरारें बंद होने से नहीं हो पाता रिचार्ज
- केंद्रीय भूजल बोर्ड के वैज्ञानिकों ने वनाग्नि पर जताई चिंता
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राज्य के पहाड़ी इलाकों के जंगलों में लगी आग पर जल्द काबू नहीं पाया गया तो निकट भविष्य में गंभीर जल संकट भी पैदा हो सकता है। केंद्रीय भूजल बोर्ड के वैज्ञानिकों ने वनाग्नि पर चिंता व्यक्त की है। उनके अनुसार आग से भूजल का स्तर प्रभावित होने की आशंका है, जिसका परिणाम बहुत जल्द देखने को मिलेगा। इससे पहाड़ी क्षेत्रों में भूजल के स्तर में गिरावट, जल स्रोत के सूखने और दिशा बदलने के मामले सामने आ सकते हैं।
पहाड़ों में आबादी का बड़ा हिस्सा भूजल पर ही निर्भर है। पेयजल से लेकर दैनिक उपयोग तक में यह लोग भूजल का इस्तेमाल करते हैं। पहाड़ों में भूजल के स्त्रोत बारिश से लगातार रिचार्ज होते हैं। केंद्रीय भूजल बोर्ड के वैज्ञानिकों के अनुसार बारिश का पानी जमीन में उगी घास और छोटी वनस्पतियों के कारण धीरे-धीरे जमीन के भीतर जाता है।
इसके अलावा जगह-जगह बनी दरारें भी जल स्रोत को रिचार्ज करने का काम करती है। जंगलों में आग लगने से राख के कारण दरारें बंद हो जाती है। इससे बारिश का पानी जमीन के अंदर नहीं जा पाता।
आग लगने से ऐसे आता है जल संकट
इसके अलावा आग लगने से वनस्पतियां व घास पूरी तरह खत्म हो जाती है, जिससे बारिश का पानी एक जगह जमा नहीं होता और तेजी से बह जाता है। इससे नमी जमीन के भीतर नहीं जाती। दूसरी ओर मिट्टी की सबसे उपजाऊ मानी जाने वाली ऊपरी परत भी बह जाती है। वनाग्नि से ज्यादातर जंगलों की घास पूरी तरह जल चुकी है, ऐसे में अब अगर अच्छी बारिश नहीं हुई तो भूजल के स्तर में गिरावट आनी तय है।
रास्ता बदलते हैं जल स्रोत
आमतौर पर आग लगने की घटना के बाद जल स्रोत अपना रास्ता बदल देते हैं। जमीन के भीतर मिट्टी पड़ने या राख इत्यादि से स्रोत बंद होने पर पानी दूसरी जगह से निकलने लगता है। वहीं कई बार मिट्टी फटने पर पानी ज्यादा गहराई में चला जाता है।
इनका है कहना
आग से जमीन में बनी दरारें बंद हो जाती है। बारिश के पानी को रोकने वाली वनस्पतियां और घास जलने से पानी जमीन के भीतर नहीं जा पाता। इससे जल स्रोत के सूखने का खतरा बढ़ जाता है।
-गणेश बड़थ्वाल, वैज्ञानिक, केंद्रीय भूजल बोर्ड