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आपदाः दरारों में रहने को मजबूर है एक गांव
सुधाकर भट्ट/अमर उजाला, कालीमठ घाटी
Updated Tue, 31 Dec 2013 11:26 AM IST
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जहां एक तरफ पूरी दुनिया नए साल का जश्न मना रही है, वहीं उत्तराखंड के कालीमठ घाटी का आखिरी गांव चौमासी दुनिया से कटा हुआ है।
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आपदा के छह महीने बाद भी यह गांव अपनी खिसकी और दरकी हुई बुनियाद पर किसी तरह टिका है।
धस चुकी है खेती की जमीन
इस गांव तक जैसे-तैसे कुछ गाड़ियां जरूर पहुंच रही हैं लेकिन जान जोखिम में डालकर। गांव के करीब 35 परिवारों के घर भू-धसाव की जद मे हैं। गांव में खेती की जमीन भी धस चुकी है।
गांव के पास ग्राम पंचायत की कुछ जमीन जरूर है लेकिन अभी तक न तो यहां प्री फेब्रीकेटेड घर खड़े हुए हैं। और न ही गांव के लोगों के लिए सुरक्षित आवास की कोई व्यवस्था ही हुई है। जलप्रलय में बह गई गांव की करीब पांच सौ नाली जमीन का अभी तक कोई सर्वे भी नहीं हुआ है।
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शुक्र है गांव की बिजली बहाल हो गई है। जिससे कालीमठ के लोगों की स्याह जिंदगी में कुछ उजाला है। जून की आपदा के बाद मैं अगस्त में चौमासी आया था। उस समय जो भय यहां लोगों केचहेरे पर दिखता था उससी जगह भविष्य की चिंताओं ने घेर ली है।
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उन्हें डर इस बात का है कि कहीं अधिक बारिश हुई तो वह दुनिया से कट जाएंगे। केदारनाथ आपदा में इस गांव के12 लोगों ने अपनी जान गंवाई है। 70 परिवारों का यह गांव आजीविका के लिए पूरी तरह से केदारनाथ यात्रा पर निर्भर है।
सम्पर्क मार्ग टूटे हुए
आपदा के बाद चौमासी के सामने रोजी-रोटी का संकट था। सारे सम्पर्क मार्ग टूटे हुए थे। बिजली गुल थी। लोगों को राशन के लिए गुप्तकाशी तक 35 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई चढ़नी पड़ती थी। अब यहां के लोगों ने डरकर राशन जुटाना शुरू कर दिया है।
किसी को मार्च-अप्रैल में बेटे-बेटी की शादी की चिंता है तो रास्ता कट जाने पर कैसे गुजारा होगा इस चिंता में डूबा है। यहां के करीब दस खच्चर आपदा की भेंट चढ़ गए। ऐसे में सामान लाने ले जाने के लिए लोगों को महीनों अपनी मजबूत पीठ पर भरोसा किया।
छह महीने बाद भी कमोवेश वैसे ही दृश्य और हालात हैं। खच्चर हैं नहीं और गाड़ी वाले जोखिम भरे रास्ते को तय करने की कीमत वसूलते हैं जिससे सामान भी मंहगा मिलता है।
मुंह खोली हुई हैं बड़ी-बड़ी दरारे
कालीमठ घाटी के गांव जाल मल्ला, तल्ला, कोटमा कबिल्ठा, चिलौंठ आदि की त्रासदी यह है कि इनके अपने घरों की बुनियाद खिसक गई है, जो सुरक्षित हो गए हैं। छह महीने पहले जब मैं इन गांवों में पहुंचा था तो गांव के लोगों आसपास की बड़ी-बड़ी दरारें दिखाई थीं जो आज भी किसी मुसीबत की तरह मुंह खोले खड़ी हैं।
सरकारी पुनर्वास की बात तो गांव के लोग सोच भी नहीं पा रहे हैं। प्री फेब्रीकेटेड मकान अभी कहीं इनसे दूर हैं। फिर नियम कानून के तहत केदार नाथ के आसपास प्रतिबंधित जमीन पर नया मकान बनाना मुश्किलों व चुनौती भरा है।
मुझे ऐसे भी लोग मिले जिन्हें अभी खच्चरों तक का मुआवाजा नहीं मिला है। चिलौंठ के कीरथ सिंह को घोड़े का सिर्फ 15 हजार रुपए मुआवजा मिला है।
सरकार ने कहा था आपदाग्रस्त लोगों के बिजली के बिल माफ होंगे लेकिन अब एक साथ कई-कई महीनों के बिल आ रहे हैं। गांव के प्रधान सुरेन्द्र सिंह तिंदौरी उन मकानों के लिए जिनकी बुनियाद हिल चुकी हैं। उन्हें डर है बारिश का।
मुआवजा भी नहीं मिला
अगर तेजी बारिश होती है तो उनके गांव पूरी तरह से अलग-थलग पड़ जाएंगे। गांव के राय सिंह तिंदौरी बताते हैं हमारे खेत दस मीटर नीचे खिसक गए हैं।
फसल का मुआवजा भी अभी तक नहीं मिला है। गांव की जमीनी दिक्कतें और असुविधा देखकर नहीं लगता कि जो घोषणाएं हो रही हैं वह कभी पहुंचेंगी भी नहीं।