16 साल बीत गए, मंडल मिला न मुख्यालय, ट्रेन के भी ‘लाले’
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उत्तराखंड बने 16 साल हो गए हैं, लेकिन आज तक राज्य को अलग रेल मंडल नहीं मिल पाया है। रेल मंत्रालय ने इस लिहाज से राजधानी देहरादून को यह भी सम्मान नहीं दिया है कि कुछ ऐसी व्यवस्था कर दे कि लोगों को छोटे-छोटे काम के लिए मुरादाबाद का चक्कर न लगाना पड़े। रेल मंत्रालय की इस उपेक्षा का खामियाजा रेल यात्रियों, कर्मचारियों और यहां के आम लोगों को भुगतना पड़ रहा है।
उत्तराखंड के लोगों की लंबे समय से मांग रही है कि राजधानी देहरादून में अलग रेल मंडल की स्थापना की जाए। ताकि यात्री सुविधाओं के साथ ही राज्य में रेल सुविधाओं को विस्तार देने में मदद मिल सके और छोटी-छोटी चीजों के लिए 212 किलोमीटर दूर मुरादाबाद के चक्कर न काटना पड़े।
वर्ष 1996 में तत्कालीन रेल राज्य मंत्री सतपाल महाराज ने सीनियर स्केल अफसर के रूप में दून में एरिया मैनेजर की नियुक्ति की थी। एरिया मैनेजर को यात्री कोटा लगाने, मेंटेनेंस समेत सभी अनुभागों से संबंधित जरूरी कार्यों के सैंक्शन और कर्मचारियों से जुड़ी समस्याओं के यथासंभव समाधान की पॉवर थी। उनके रेल राज्य मंत्री से हटने के बाद यह व्यवस्था भी खत्म कर दी गई।
रेल मंडल न होने से यह हो रहा है, नुकसान
रेल मंडल न होने से ट्रेनों की मेंटेनेंस ठीक से नहीं हो रही है। मंडल बनने से यहां पर यांत्रिक मंडल अभियंता (एमडीई) की पोस्ट भी होगी और यांत्रिकी का स्टाफ बढ़ेगा। इससे यहां से रवाना होनी वाली ट्रेनों की तसल्लीबख्श मेंटेनेंस की जा सकती है। अभी दून से रवाना होने वाली ट्रेनों की प्राइमरी मेंटेनेंस ही होती है।
करीब डेढ़ साल पहले जनता एक्सप्रेस के लखनऊ के समीप दुर्घटनाग्रस्त होने के पीछे इस ट्रेन का दून से रवाना करते वक्त ठीक से मेंटनेंस न होना भी एक प्रमुख कारण सामने आया था। पूर्व में यहां कुछ समय के लिए सहायक यांत्रिक मंडल अभियंता (एएमडीई) का पद सृजित किया गया था। बाद में एएमडीई भी वापस हो गए।
दिव्यांग यात्रा पास के लिए करना पड़ता है इंतजार
रेलवे दिव्यांग यात्रियों को ट्रेन में सफर के दौरान किराए में छूट देता है। भले ही इसके लिए यहां आवेदन हो जाता है, लेकिन यात्रा पास पर हस्ताक्षर करने वाले सक्षम अधिकारी भी मुरादाबाद में बैठते हैं। ऐसे में दिव्यांगों को यात्रा पास के लिए कई दिन इंतजार करना पड़ता है।
दून में नहीं मिल पाता यात्री कोटा
देहरादून, हरिद्वार, ऋषिकेश समेत विभिन्न स्टेशनों से यात्रा करने पर रिजर्वेशन के लिए कोटा व्यवस्था भी मुरादाबाद से ही संचालित होती है। इन स्टेशनों पर कोटा आवेदन लगाने के बावजूद फाइनल अनुमति के लिए मुरादाबाद भेजा जाता है। मंडल बनने पर यात्रियों को यह सुविधा दून में मिलने लगेगी।
आमजन की समस्या का भी नहीं होता यहां समाधान
फाटक चौड़ीकरण की मांग हो, रेलवे कार्यों की वजह से प्रभावित हुए सड़कों, जमीन अधिग्रहण के इश्यू आदि विभिन्न मांगों के लिए आम लोगों को बार-बार मुरादाबाद जाना पड़ता है। अपनी छोटी-बड़ी समस्याओं के लिए बार-बार मुरादाबाद जाने पर लगने वाला समय और खर्च हर आम आदमी वहन नहीं कर सकता। इसलिए लोगों की समस्या के समाधान में भी दिक्कत आती है।
नहीं ले पाते कोच बढ़ाने का निर्णय
पीक सीजन में यात्रियों की संख्या बढ़ने पर यहां मौजूद अधिकारी किसी ट्रेन में कोच बढ़ाने का निर्णय नहीं ले सकते हैं। इसके लिए मुरादाबाद मंडल से अनुमति ली जानी होती है। कई बार प्रक्रिया लंबी होने के कारण समय पर कोच नहीं बढ़ पाते। इससे यात्रियों को तो असुविधा होती ही है, रेलवे की आमदनी पर भी फर्क पड़ता है।
तिरपाल के लिए भी लंबा इंतजार
दून में मंडल बनने से रेलवे के देहरादून, हरिद्वार, ऋषिकेश आदि स्टेशनों और झड़ीपानी (मसूरी) स्थित रेलवे स्कूल में कार्यरत लगभग 5000 से अधिक रेलकर्मियों को भी फायदा होगा। अभी इन रेलकर्मियों को अपना यात्रा भत्ता, मेडिकल भत्ता या विभाग से जुड़े दूसरे विभागीय कार्यों के लिए बाकायदा छुट्टी लेकर मुरादाबाद जाना पड़ता है। यहां तक कि बरसात में अगर रेलवे आवास में छत टपकने लगे तो तिरपाल के लिए भी मुरादाबाद से अनुमति मिलने का इंतजार करना पड़ता है।
समय और पैसे की होती है फिजूलखर्ची
मुरादाबाद रेल मंडल के अफसरों का हर महीने अक्सर दून, हरिद्वार और ऋषिकेश का दौरा लगा रहता है। अधिकारियों के लिए बाकायदा अलग से कोच जुड़कर भी लाया जाता है। इससे समय के साथ ही रेलवे का बहुत खर्च आता है। मंडल स्तरीय अधिकारी यहीं बैठेंगे तो इससे रेलवे के समय और पैसे की फिजूलखर्ची भी रुकेगी। भारत सरकार की महत्वाकांक्षी ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन योजना की मानीटरिंग में भी समय-समय पर हो सकेगी।
राजपत्रित प्रोटोकॉल अफसर भी नहीं
स्थिति यह है कि यहां पर एक डॉक्टर (मंडल चिकित्साधिकारी) के अलावा दूसरा कोई राजपत्रित अधिकारी नहीं है। यहां तक कि किसी वीवीआईपी के आने पर गैर राजपत्रित अधिकारी ही प्रोटोकॉल अफसर की भूमिका में नजर आते हैं। कुछ रेलकर्मी इसे भी सम्मान के खिलाफ बताते हैं।
‘नया मंडल बनाने का निर्णय रेल मंत्रालय के स्तर से लिया जाता है। देहरादून में मंडल बनाने जैसे किसी प्रस्ताव या इसकी सुगबुगाहट की जानकारी संज्ञान में नहीं है।’
-नीरज शर्मा सीपीआरओ, उत्तर रेलवे नई दिल्ली