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सावधान! कहीं आप भी तो यहां नहीं खा रहे मिलावटी खाना

Wed, 03 May 2017 11:48 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून
ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून Updated Wed, 03 May 2017 11:48 PM IST
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adulterated food sale in uttarakhand according to cag report
Demo Pic - फोटो : demo

उत्तराखंड में जो भोजन, मिठाई या कोई और खाद्य सामग्री खरीदी या बेची जा रही है, उसकी गुणवत्ता की कोई गारंटी नहीं है। खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण अब भी हजारों खाद्य व्यवसायियों पर शिकंजा नहीं कस पाया।

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94 फीसदी व्यवसायी निरीक्षण की कार्रवाई से महफूज हैं और मिलावट के जिन प्रकरणों की जांच करने के लिए उसने रूद्रपुर स्थित प्रयोगशाला भेजी उनकी रिपोर्ट आने में औसतन 20 से 125 दिन की देरी हो गई। ये खुलासा भारत के नियंत्रण एवं महालेखापरीक्षक की रिपोर्ट में हुआ है।
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रिपोर्ट के मुताबिक, सुरक्षित एवं पौष्टिक भोजन की उपलब्ध कराने को खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम 2006 लागू है। राज्य में ये विनियमन अगस्त 2011 से प्रभावी है।
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इस अधिनियम के तहत राज्य के खाद्य व्यवसायियों का पंजीकरण होना है और 12 लाख रुपये का वार्षिक कारोबार करने वाले खाद्य व्यवसायियों को लाइसेंस जारी होने हैं। मार्च 2016 तक राज्य में 61,228 छोटे पंजीकृत खाद्य व्यवसायी थे। 7696 लाइसेंसधारी में से 3,493 लाइसेंसधारी व्यवसायी देहरादून और नैनीताल जनपद के थे। 

94 प्रतिशत व्यवसायियों का निरीक्षण ही नहीं 

adulterated food sale in uttarakhand according to cag report

लाइसेंस जारी करने में हीलाहवाली
कैग ने ऑडिट के दौरान पाया कि आयुक्त, खाद्य सुरक्षा एवं मानक व्यवसायियों के लाइसेंस समय पर उपलब्ध नहीं करा रहे हैं। कायदे से लाइसेंस 60 दिन के भीतर जारी हो जाने चाहिए। मगर लाइसेंस जारी करने में निर्धारित समयावधि से 20 से 180 दिन अधिक लग रहे हैं। ऐसे 42 प्रतिशत लाइसेंस हैं जिन्हें जारी करने में 60 से दिन अधिक का समय लगा।

94 प्रतिशत व्यवसायियों का निरीक्षण ही नहीं 
ऑडिट में ये तथ्य भी उजागर हुआ कि खाद्य व्यवसायियों के प्रतिष्ठानों पर निरीक्षण की प्रभावी कार्रवाई अमल में नहीं लाई गई। ऐसे 94 प्रतिशत व्यवसायी निरीक्षण की परिधि से बाहर थे।

ऐसे तो हो गया क्वालिटी चैक
खाद्य सामग्रियों की जांच के नमूने जिस प्रयोगशाला में भेजे जा रहे हैं, उसके खुद ही बुरे हाल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, रूद्रपुर स्थित प्रयोगशाल में 28 पद सृजित हैं, जिनमें सरकारी विश्लेषक, लोक विश्लेषक, सूक्ष्म जैविकी विशेषज्ञ, वरिष्ठ विश्लेषक, तकनीकी विशेषज्ञ, वैज्ञानिक अधिकारी, 12 कनिष्ठ विश्लेषक व तीन वैज्ञानिक सहायक के पद शामिल हैं। मगर इनमें से आडिट के दौरान सिर्फ छह कनिष्ठ विश्लेषक कार्यरत थे। स्टॉफ की कमी के चलते जिस रिपोर्ट को 20 दिन में जारी हो जाना था, उसे आने में औसतन 125 दिन की देरी हुई।  

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