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Dehradun News: पहाड़ी क्षेत्रों में प्रदेश से अधिक 38.4 प्रतिशत शिशु मृत्यु दर
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I- शिशु असमय बन रहे काल के ग्रास, अभिभावक जागरूक नहीं, अस्पताल बदहाल
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I- पोषण की कमी और उपचार का अभाव है मुख्य कारणI
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) पांच के मुताबिक प्रदेश में एक माह से एक साल तक के शिशुओं की मृत्यु दर 35.2 फीसदी है। हालांकि एनएफएचएस चार के मुकाबले शिशु मृत्यु दर में 5.5 फीसदी की कमी दर्ज की गई है। तब सर्वे में शिशु मृत्यु दर 40.7 फीसदी थी। प्रदेश के मैदानी क्षेत्रों में शिशु मृत्यु दर 26.6 फीसदी है। जबकि पर्वतीय क्षेत्रों के आंकड़े चौकाने वाले है। पर्वतीय क्षेत्रों में प्रदेश की दर से भी अधिक 38.4 फीसदी शिशु मृत्यु दर है।
उपजिला अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक और वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. विजय सिंह ने बताया कि स्वच्छता की कमी, दूषित पानी का सेवन, गर्भावस्था के दौरान मां और शिशु में पोषण की कमी, जन्म के बाद अच्छी देखभाल न होना, मां के दूध के विकल्प शिशुओं की मृत्यु दर के बढ़ने के मुख्य कारण होते हैं।
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उन्होंने कहा कि पहाड़ों में पारंपरिक खाद्य पदार्थों से दूरी बनाना, मां के दूध की जगह गाय और भैंस का दूध का प्रयोग और छह माह के बाद शिशु को भोजन न देना आदि से शिशुओं में कुपोषण की आशंका बढ़ जाती है। कमजोर शिशु आसानी से सामान्य और गंभीर बीमारी की चपेट में आ जाते हैं।
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Iपहाड़ों में एनआईसीयू और पीआईसीयू की कमीI
पर्वतीय क्षेत्रों में एनआईसीयू और पीआईसीयू की कमी है। शिशुओं में बीमारी के गंभीर लक्षण होने पर उनको गहन चिकित्सा और विशेषज्ञ परामर्श की जरूरत होती है। ऐसे में शिशुओं को एनआईसीयू और पीआईसीयू में भर्ती किया जाता है। लेकिन पर्वतीय क्षेत्रों के अस्पतालों में एनआईसीयू और पीआईसीयू नहीं है। जौनसार क्षेत्र की बात करें तो यहां सीएचसी चकराता, साहिया और पीएचसी कालसी में एनआईसीयू और पीआईसीयू नहीं है। यहां गंभीर शिशुओं को उपचार के लिए विकासनगर या देहरादून लाना पड़ता है।