देवभूमि के इस मेले में हर साल जलती है 27 से 30 फुट लंबी मशाल, इसलिए पहाड़ी मेलों में सबसे खास
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सांस्कृतिक रूप से समृद्ध बौराणी क्षेत्र का प्रसिद्ध कार्तिक पूर्णिमा का ऐतिहासिक मेला सैम मंदिर प्रांगण में शुक्रवार की सुबह शुरू हो गया।
मेले का मुख्य आकर्षण पुलईचापड़ गांव से लाई जाने वाली छिलके (चीड़ का ज्वलनशील पदार्थ) से निर्मित 27 फुट लंबी मशाल होती है। इस मशाल को प्रत्येक मेलार्थी द्वारा अवश्य देखने की परंपरा है।
रात 12 बजे मंदिर परिसर में मशाल के पहुंचने पर लोगों का हुजूम हाथ जोड़ कर स्वागत करता है। मंदिर की सात परिक्रमा के बाद इसे परिसर में गाड़ दिया जाता है। स्थानीय लोगों के अनुसार सैम मंदिर में कार्तिक पूर्णिमा को मशाल लाने की परंपरा सदियों पुरानी है। लोग इसे सुख, शांति और समृद्धि का प्रतीक भी मानते हैं।
सुबह 11 बजे हुअा औपचारिक उद्घाटन
क्षेत्र के जिपं सदस्य और महोत्सव समिति के अध्यक्ष राजेंद्र बोरा का कहना है कि अगर बौराणी की ऐतिहासिक संस्कृति को प्रोत्साहित किया जाए तो यह क्षेत्र पर्यटन के रूप में विकसित हो सकता है।
मशाल गाड़ने के बाद यहां नोर्त और झोड़ा-चांचरी का अद्भुत परंपरागत कार्यक्रम शुरू हो जाता है। क्षेत्र के प्रसिद्ध चांचरी जिलार धन राम जब अपने हुड़के पर थाप देने के साथ चांचरी के बोल शुरू करते हैं तो सैकड़ों महिला-पुरुष मैदान में अपना हुनर पेश करने उतर आते हैं। मान्यता है कि अखंड धूनी में देव डांगर नौर्त के माध्यम से श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूरी करते हैं।
बौराणी मेला एवं लोक संस्कृति महोत्सव कार्यक्रम का उद्घाटन सुबह 11 बजे विधायक मीना गंगोला ने किया। बताया कि कार्यक्रम में स्कूली बच्चे, स्थानीय लोक कलाकार, पुष्कर महर एंड पार्टी, विहान ग्रुप, जितेंद्र तोमक्याल, कल्याण बोरा एंड पार्टी अपनी प्रस्तुति देंगे। कार्यक्रम देर रात तक चलेंगे।
अब नहीं होता बौराणी में कुख्यात जुआ मेला
बौराणी में परंपरागत मेले के साथ यहां जुआ खेलने की कुप्रथा सदियों से चली आ रही थी। बाद में इस कुप्रथा ने इतना जबरदस्त रूप ले लिया था कि लोग इस मेले को जुआ मेले के रूप में जानने लगे।
यहां तक कि कुमाऊं के अलावा मैदानी इलाकों के लोग भी इस दौरान जुएं पर अपनी किस्मत आजमाने आते थे। परंपरागत मेले से कुछ दूरी पर लम्केश्वर की पहाड़ी पर जुएं के सैकड़ों फड़ लगते थे। वर्ष 2004 में तत्कालीन एसडीएम श्रीश कुमार ने स्थानीय युवाओं के सहयोग से यहां जुआ मेले में लगने वाले फड़ पूरी तरह से बंद कराने में सफलता हासिल की।
अगले साल बौराणी मेला एवं लोक संस्कृति महोत्सव की नींव रखी गई। तबसे मेले में जुआ की परंपरा बंद हो गई और सांस्कृतिक पक्ष में लगातार निखार आता गया।
जब वेश बदल कर कवरेज को जाते थे पत्रकार
वर्ष 1994 में अमर उजाला ने पहली बार मेले के रूप में आयोजित होने वाले जुए का खुलासा किया। तब सड़क मार्ग राईआगर से लम्केश्वर की पहाड़ी 15 किलोमीटर की चढ़ाई पर थी। इसके बाद हर साल अमर उजाला में इस कुप्रथा और सांस्कृतिक मेले की कवरेज जारी रही।
अमर उजाला के लगातार खुलासे के बाद यह कुप्रथा स्थानीय प्रशासन के लिए चुनौती बन गई। तब प्रशासन ने इस पर रोकथाम की कोशिश की लेकिन बड़े पैमाने पर होने वाले इस आयोजन में कुछ कमी आने के बाद भी यह पूरी तरह बंद नहीं हो पाया। जुएं के फड़ चलाने वाले लोगों को यह नागवार गुजरा।
उन्होंने पत्रकारों को निशाना बनाने का प्रयास किया। इन परिस्थितियों के कारण रात को होने वाले इस आयोजन में पत्रकार सुरक्षा कारणों से वेश बदल कर जाने लगे। यह सिलसिला इस कुप्रथा के अंत होने तक जारी रहा।