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काश! मिल जाते किताबों के पैसे
Updated Fri, 06 Jul 2018 10:32 PM IST
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कोटद्वार। खूनीबड़ निवासी दसवीं के छात्र सौरभ की खुदकुशी ने सरकारी सिस्टम पर भी सवाल खड़े किए हैं। उसके परिजनों और ग्रामीणों का कहना है कि सरकार की ओर से पुस्तकों के लिए मिलने वाले पैसे मिल जाते तो शायद सौरभ की जान नहीं जाती। मुख्य शिक्षा अधिकारी पौड़ी ने इस मामले की विभागीय जांच के आदेश खंड शिक्षा अधिकारी दुगड्डा को दिए हैं।
बता दें कि हाईस्कूल शिवराजपुर (जीवानंदपुर) में दसवीं के छात्र सौरभ ने किताबें नहीं मिलने पर बृहस्पतिवार को फांसी लगाकर जान दे दी थी। उसका परिवार दुर्गापुर ग्राम पंचायत के खूनीबड़ गांव में अपने ननिहाल में रहता है। उसकी दो छोटी बहिनें सोनिया, संजना और एक छोटा भाई साहिल है। सोनिया भी दसवीं की छात्रा है। वह जीजीआईसी घमंडपुर में पढ़ती है। छोटी बहन संजना भी जीजीआइसी घमंडपुर में कक्षा नौ की छात्रा है। छोटा भाई साहिल इस साल से स्कूल जाना शुरू करेगा। परिवार की आजीविका पिता की मेहनत मजदूरी पर टिकी है। पिता रवींद्र सिंह सीजनल मजदूरी करते हैं। घर का खर्च पूरा न होने पर मां बागेश्वरी देवी पिछले दो तीन महीने से सिगड्डी सिडकुल की फैक्ट्री में अकुशल श्रमिक की नौकरी कर रही है।
यहां यह भी उल्लेखनीय है कि राज्य सरकार की ओर से हाईस्कूल में पढ़ने वाले अनुसूचित जाति और जनजाति के छात्र-छात्राओं को भी निशुल्क पाठ्य-पुस्तकें दिलाने की व्यवस्था है। पूर्व में छात्र-छात्राएं पुस्तकें खरीदकर उसका बिल विद्यालय प्रशासन को सौंपते थे, जिसके आधार पर छात्रों को उसका भुगतान खाते में कर दिया जाता था। अब इस व्यवस्था में बदलाव कर दिया गया है। अब पाठ्य पुस्तकों का पैसा विभाग की ओर से सीधे विद्यार्थियों के खाते में देने की व्यवस्था की गई है। इसके तहत हाईस्कूल शिवराजपुर (जीवानंदपुर) के दसवीं के अनुसूचित जाति के छात्र सौरभ सिंह को सरकार की ओर से छह सौ रुपये किताब के लिए मिलने थे, लेकिन सरकार की ओर से छात्र-छात्राओं के खाते में तो दूर यह पैसा जिले को भी आवंटित नहीं हो सका है। पौड़ी के मुख्य शिक्षा अधिकारी मदन सिंह रावत का कहना है कि अनुसूचित जनजाति का पैसा काफी पहले मिल चुका है लेकिन अनुसूचित जाति के लिए यह पैसा अभी तक आवंटित नहीं हुआ है।
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बता दें कि हाईस्कूल शिवराजपुर (जीवानंदपुर) में दसवीं के छात्र सौरभ ने किताबें नहीं मिलने पर बृहस्पतिवार को फांसी लगाकर जान दे दी थी। उसका परिवार दुर्गापुर ग्राम पंचायत के खूनीबड़ गांव में अपने ननिहाल में रहता है। उसकी दो छोटी बहिनें सोनिया, संजना और एक छोटा भाई साहिल है। सोनिया भी दसवीं की छात्रा है। वह जीजीआईसी घमंडपुर में पढ़ती है। छोटी बहन संजना भी जीजीआइसी घमंडपुर में कक्षा नौ की छात्रा है। छोटा भाई साहिल इस साल से स्कूल जाना शुरू करेगा। परिवार की आजीविका पिता की मेहनत मजदूरी पर टिकी है। पिता रवींद्र सिंह सीजनल मजदूरी करते हैं। घर का खर्च पूरा न होने पर मां बागेश्वरी देवी पिछले दो तीन महीने से सिगड्डी सिडकुल की फैक्ट्री में अकुशल श्रमिक की नौकरी कर रही है।
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यहां यह भी उल्लेखनीय है कि राज्य सरकार की ओर से हाईस्कूल में पढ़ने वाले अनुसूचित जाति और जनजाति के छात्र-छात्राओं को भी निशुल्क पाठ्य-पुस्तकें दिलाने की व्यवस्था है। पूर्व में छात्र-छात्राएं पुस्तकें खरीदकर उसका बिल विद्यालय प्रशासन को सौंपते थे, जिसके आधार पर छात्रों को उसका भुगतान खाते में कर दिया जाता था। अब इस व्यवस्था में बदलाव कर दिया गया है। अब पाठ्य पुस्तकों का पैसा विभाग की ओर से सीधे विद्यार्थियों के खाते में देने की व्यवस्था की गई है। इसके तहत हाईस्कूल शिवराजपुर (जीवानंदपुर) के दसवीं के अनुसूचित जाति के छात्र सौरभ सिंह को सरकार की ओर से छह सौ रुपये किताब के लिए मिलने थे, लेकिन सरकार की ओर से छात्र-छात्राओं के खाते में तो दूर यह पैसा जिले को भी आवंटित नहीं हो सका है। पौड़ी के मुख्य शिक्षा अधिकारी मदन सिंह रावत का कहना है कि अनुसूचित जनजाति का पैसा काफी पहले मिल चुका है लेकिन अनुसूचित जाति के लिए यह पैसा अभी तक आवंटित नहीं हुआ है।
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