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मौत के मुहाने पर थे 118 छात्र
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ब्यूरो/अमर उजाला, विकासनगर।
प्राथमिक स्कूल कुंजा में अतिरिक्त भवन की सीढ़ियां के भरभरा कर गिरने से स्कूलों में होने वाले निर्माण कार्यों की गुणवत्ता सवालों के घेरे में आ गई है। शनिवार को हुए हादसे में जो सीढ़िया ढहीं, उनका निर्माण छह वर्ष पूर्व 2013 में भवन निर्माण के साथ हुआ था। ऐसे में इतने कम समय में सीढ़ियों का ढहना कई सवाल खड़े करता है। वहीं, अभिभावकों का आरोप है कि अतिरिक्त भवन में भी दरारें पड़ गई हैं, जिससे कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है।
स्कूल में वर्तमान में 118 छात्र अध्ययनरत हैं। सभी छात्र सीढ़ियों के आसपास ही खेल रहे थे। हादसे के वक्त कई छात्र बर्तन धोने के लिए टोंटी पर अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। हादसे के बाद से ज्यादातर छात्र डरे हुए हैं। गनीमत रही कि सिर्फ दो छात्राएं ही इसकी चपेट में आईं। यदि कोई बड़ी अनहोनी हो जाती तो उसका जिम्मेदार कौन होता? आखिरकार क्यों घटिया गुणवत्ता को अधिकारियों ने नजरअंदाज कर अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी?
जबकि, निर्माण कार्य की मॉनिटरिंग के लिए विभागीय स्तर पर तकनीकी अधिकारी मौजूद रहते हैं। धराशायी हुई सीढ़ियों में सिर्फ तीन सूत के तीन सरिये लगाए गए थे। जबकि, सीढ़ी की मजबूती के लिए पूरा जाल तैयार किया जाना चाहिए था, लेकिन विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत के चलते निर्माण कार्य में सुरक्षा मानकों को दरकिनार कर दिया गया। जन संघर्ष मोर्चा के जिला मीडिया प्रभारी पिन्नी शर्मा का कहना है कि विभागीय अधिकारी गुणवत्ता से ज्यादा कमीशन को तवज्जो देते हैं। यही वजह है कि निर्माण कार्य में घोर लापरवाही की गई। पिन्नी शर्मा ने कार्यदाई संस्था और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने की मांग की है।
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वहीं, मामले में उपखंड शिक्षाधिकारी हिमांशु श्रीवास्तव का कहना है कि इस बात की जांच की जाएगी कि आखिर सीढ़ियां गिरी कैसे। दोषियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए मामले में रिपोर्ट तैयार कर उच्चाधिकारियों को भी भेजी जाएगी।
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प्राथमिक स्कूल कुंजा में अतिरिक्त भवन की सीढ़ियां के भरभरा कर गिरने से स्कूलों में होने वाले निर्माण कार्यों की गुणवत्ता सवालों के घेरे में आ गई है। शनिवार को हुए हादसे में जो सीढ़िया ढहीं, उनका निर्माण छह वर्ष पूर्व 2013 में भवन निर्माण के साथ हुआ था। ऐसे में इतने कम समय में सीढ़ियों का ढहना कई सवाल खड़े करता है। वहीं, अभिभावकों का आरोप है कि अतिरिक्त भवन में भी दरारें पड़ गई हैं, जिससे कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है।
स्कूल में वर्तमान में 118 छात्र अध्ययनरत हैं। सभी छात्र सीढ़ियों के आसपास ही खेल रहे थे। हादसे के वक्त कई छात्र बर्तन धोने के लिए टोंटी पर अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। हादसे के बाद से ज्यादातर छात्र डरे हुए हैं। गनीमत रही कि सिर्फ दो छात्राएं ही इसकी चपेट में आईं। यदि कोई बड़ी अनहोनी हो जाती तो उसका जिम्मेदार कौन होता? आखिरकार क्यों घटिया गुणवत्ता को अधिकारियों ने नजरअंदाज कर अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी?
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जबकि, निर्माण कार्य की मॉनिटरिंग के लिए विभागीय स्तर पर तकनीकी अधिकारी मौजूद रहते हैं। धराशायी हुई सीढ़ियों में सिर्फ तीन सूत के तीन सरिये लगाए गए थे। जबकि, सीढ़ी की मजबूती के लिए पूरा जाल तैयार किया जाना चाहिए था, लेकिन विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत के चलते निर्माण कार्य में सुरक्षा मानकों को दरकिनार कर दिया गया। जन संघर्ष मोर्चा के जिला मीडिया प्रभारी पिन्नी शर्मा का कहना है कि विभागीय अधिकारी गुणवत्ता से ज्यादा कमीशन को तवज्जो देते हैं। यही वजह है कि निर्माण कार्य में घोर लापरवाही की गई। पिन्नी शर्मा ने कार्यदाई संस्था और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने की मांग की है।
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वहीं, मामले में उपखंड शिक्षाधिकारी हिमांशु श्रीवास्तव का कहना है कि इस बात की जांच की जाएगी कि आखिर सीढ़ियां गिरी कैसे। दोषियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए मामले में रिपोर्ट तैयार कर उच्चाधिकारियों को भी भेजी जाएगी।