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बिल्डिंगों के निर्माण से सिमटही फूलों की खेती
Updated Fri, 30 Nov 2018 01:47 AM IST
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ब्यूरो/अमर उजाला, रायवाला। हरिपुरकलां में कृषि भूमि पर तेजी से हो रहे व्यावसायिक निर्माण के चलते गेंदे के फूलों की खेती खत्म होने के कगार पर है। यहां के फूल वर्षों से हरिद्वार और ऋषिकेेश की आध्यात्मिक शोभा में चार चांद लगाते रहे हैं। गंगा आरती में भी पूजा के लिए हरिपुरकलां से फूल जाते हैं। जहां सुनहरे गेंदा के फूल लहलहाते थे, वहां अब कंक्रीट के जंगल उग आए हैं। हालात ऐसे बदतर हो चुके हैं कि फूलों की आपूर्ति अब पड़ोसी राज्यों से होने लगी है। तीर्थनगरी में हरिपुरकलां के फूलों की हिस्सेदारी महज दस प्रतिशत तक ही रह गई है।
देहरादून जिले की सीमा पर बसा हरिपुरकलां गांव कभी अपनी उन्नत फूलों की खेती के लिए जाना जाता था। यहां के किसान भी अपनी नियमित फसलों के बजाय फूलों की खेती को ही प्राथमिकता देते थे। इसका मूल कारण यहां की रेतीली उपजाऊ मिट्टी है। इसमें उगने वाला मैरी गोल्ड किसानों को नकदी के साथ कम क्षेत्रफल में अधिक कमाई का प्रमुख जरिया बना हुआ था। पिछले दस सालों में यहां भी विकास की आबोहवा ने परंपरागत खेती को जड़ से मिटाना शुरू कर दिया है। खेतों में अब इमारतें बनने लगी हैं। तेजी से बढ़ रहे व्यावसायिक निर्माणों ने फूलों की खेती को सिकोड़ दिया है। इस अंधाधुंध निर्माण ने फूलों की खेती को 30 प्रतिशत तक समेट दिया है।
इमारतों से घिरे खेत, पैदावार गिरी
फूलों की खेती करने वाले किसान अपने खेतों के आसपास उग चुके कई मंजिला अपार्टमेंट के बीच घटती उपजाऊ क्षमता के चलते मायूस हैं। ज्यादातर किसानों ने पिछले कुछ सालों में फूलों की खेती से हाथ खींच लिया है। ग्राम प्रधान सतेंद्र धमांदा ने बताया कि हरिपुरकलां में फुलों की घटती हिस्सेदारी का पहला कारण पिछले दस वर्षों के भीतर हाबी हुई आधुनिकता है। तीर्थनगरी में लगातार आपूर्ति घटने के कारण हरिपुरकलां के फूलों की जगह पड़ोसी राज्यों ने ले ली। अब कम कीमत पर अन्य राज्यों से फूलों की सप्लाई हो रही है। आज भी गांव में कई परिवार कुल खेती के तीस प्रतिशत भूमि पर फूलों की खेती करते हैं। मुनासिब दाम न मिलने से उनमें भी निराशा है।
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देहरादून जिले की सीमा पर बसा हरिपुरकलां गांव कभी अपनी उन्नत फूलों की खेती के लिए जाना जाता था। यहां के किसान भी अपनी नियमित फसलों के बजाय फूलों की खेती को ही प्राथमिकता देते थे। इसका मूल कारण यहां की रेतीली उपजाऊ मिट्टी है। इसमें उगने वाला मैरी गोल्ड किसानों को नकदी के साथ कम क्षेत्रफल में अधिक कमाई का प्रमुख जरिया बना हुआ था। पिछले दस सालों में यहां भी विकास की आबोहवा ने परंपरागत खेती को जड़ से मिटाना शुरू कर दिया है। खेतों में अब इमारतें बनने लगी हैं। तेजी से बढ़ रहे व्यावसायिक निर्माणों ने फूलों की खेती को सिकोड़ दिया है। इस अंधाधुंध निर्माण ने फूलों की खेती को 30 प्रतिशत तक समेट दिया है।
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इमारतों से घिरे खेत, पैदावार गिरी
फूलों की खेती करने वाले किसान अपने खेतों के आसपास उग चुके कई मंजिला अपार्टमेंट के बीच घटती उपजाऊ क्षमता के चलते मायूस हैं। ज्यादातर किसानों ने पिछले कुछ सालों में फूलों की खेती से हाथ खींच लिया है। ग्राम प्रधान सतेंद्र धमांदा ने बताया कि हरिपुरकलां में फुलों की घटती हिस्सेदारी का पहला कारण पिछले दस वर्षों के भीतर हाबी हुई आधुनिकता है। तीर्थनगरी में लगातार आपूर्ति घटने के कारण हरिपुरकलां के फूलों की जगह पड़ोसी राज्यों ने ले ली। अब कम कीमत पर अन्य राज्यों से फूलों की सप्लाई हो रही है। आज भी गांव में कई परिवार कुल खेती के तीस प्रतिशत भूमि पर फूलों की खेती करते हैं। मुनासिब दाम न मिलने से उनमें भी निराशा है।
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