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समान नागरिक संहिता लागू हो : बजरंग मुनि
Updated Mon, 26 Nov 2018 02:03 AM IST
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ब्यूरो/अमर उजाला/ऋषिकेश।
बजरंग मुनि सामजिक शोध संस्थान की ओर से रविवार को आयोजित साप्ताहिक ज्ञान यज्ञ के दौरान धर्म एवं सम्प्रदाय विषय पर परिचर्चा की गई। इस अवसर पर बजरंग मुनि ने सभी धर्मों को दरकिनार कर समान नागरिक संहिता नागरिक संहिता लागू करने की बात कही।
देहरादून रोड़ स्थित प्रबंध कार्यालय में रविवार को कार्यक्रम का शुभारंभ हवन यज्ञ में विश्व शांति के लिए आहुति डालकर किया गया। बजरंग मुनि ने कहा कि वर्तमान में हम बीते तीन हजार वर्षों की समीक्षा करें तो दो ही धर्म सनातन दिखते हैं। इसमें एक आर्य सनातन हिंदू जीवन पद्धति दूसरा पाश्चात्य व यहूदी जीवन पद्धति। हिंदू जीवन पद्धति से कुछ धड़े निकलकर तेजी से बढ़े जो प्रारम्भ में संगठन रहे। इनका विस्तार कई वर्षों तक जारी रहा तब वे सम्प्रदाय कहे जाने लगे। बाद में उन्होंने खुद को धर्म कहना शुरू कर दिया। ऐसे सम्प्रदायों में ही जैन, बौद्ध अथवा सिख माने जाते हैं। इसी तरह की प्रक्रिया यहूदियों में भी दोहरायी गयी और कालांतर से उसी तरह ईसाई और इस्लाम नामक सम्प्रदाय धर्म के रूप में आगे आए। हिंदू और यहूदी मान्यताएं अलग-अलग प्रवृत्तियों में समन्वय को महत्व देती थी और सम्प्रदाय समन्वय की जगह किसी एक दिशा को अधिक महत्व देने लगे। इन विपरीत विचारधाराओं के वैचारिक टकराव ने हिंदू और यहूदियों की धार्मिक समन्वय की नीतियों को गंभीर क्षति पहुंचायी। उन्होंने कहा कि सम्पूर्ण भारतीय संविधान से धर्म शब्द को निकालकर समान नागरिक संहिता लागू कर देनी चाहिए। कोई अल्पसंख्यक बहुसंख्यक न हो धर्म परिवर्तन कराने के प्रयत्नों को भी दंडनीय अपराध घोषित किया जाए। डॉ. राजे नेगी के संचालन में हुए कार्यक्रम में उत्तम सिंह असवाल, टीकाराम, एसएस भंडारी, पीके वात्सल्य, तजस्वी, अनुसूया बिजालवान, विनोद जुगरान, रवि थपलियाल, जनार्दन केरवान आदि मौजूद रहे।
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बजरंग मुनि सामजिक शोध संस्थान की ओर से रविवार को आयोजित साप्ताहिक ज्ञान यज्ञ के दौरान धर्म एवं सम्प्रदाय विषय पर परिचर्चा की गई। इस अवसर पर बजरंग मुनि ने सभी धर्मों को दरकिनार कर समान नागरिक संहिता नागरिक संहिता लागू करने की बात कही।
देहरादून रोड़ स्थित प्रबंध कार्यालय में रविवार को कार्यक्रम का शुभारंभ हवन यज्ञ में विश्व शांति के लिए आहुति डालकर किया गया। बजरंग मुनि ने कहा कि वर्तमान में हम बीते तीन हजार वर्षों की समीक्षा करें तो दो ही धर्म सनातन दिखते हैं। इसमें एक आर्य सनातन हिंदू जीवन पद्धति दूसरा पाश्चात्य व यहूदी जीवन पद्धति। हिंदू जीवन पद्धति से कुछ धड़े निकलकर तेजी से बढ़े जो प्रारम्भ में संगठन रहे। इनका विस्तार कई वर्षों तक जारी रहा तब वे सम्प्रदाय कहे जाने लगे। बाद में उन्होंने खुद को धर्म कहना शुरू कर दिया। ऐसे सम्प्रदायों में ही जैन, बौद्ध अथवा सिख माने जाते हैं। इसी तरह की प्रक्रिया यहूदियों में भी दोहरायी गयी और कालांतर से उसी तरह ईसाई और इस्लाम नामक सम्प्रदाय धर्म के रूप में आगे आए। हिंदू और यहूदी मान्यताएं अलग-अलग प्रवृत्तियों में समन्वय को महत्व देती थी और सम्प्रदाय समन्वय की जगह किसी एक दिशा को अधिक महत्व देने लगे। इन विपरीत विचारधाराओं के वैचारिक टकराव ने हिंदू और यहूदियों की धार्मिक समन्वय की नीतियों को गंभीर क्षति पहुंचायी। उन्होंने कहा कि सम्पूर्ण भारतीय संविधान से धर्म शब्द को निकालकर समान नागरिक संहिता लागू कर देनी चाहिए। कोई अल्पसंख्यक बहुसंख्यक न हो धर्म परिवर्तन कराने के प्रयत्नों को भी दंडनीय अपराध घोषित किया जाए। डॉ. राजे नेगी के संचालन में हुए कार्यक्रम में उत्तम सिंह असवाल, टीकाराम, एसएस भंडारी, पीके वात्सल्य, तजस्वी, अनुसूया बिजालवान, विनोद जुगरान, रवि थपलियाल, जनार्दन केरवान आदि मौजूद रहे।
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