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गैरसैंण सत्र: काम काज में पास, जनाकांक्षाओं में फेल

Mon, 26 Mar 2018 10:40 PM IST
Updated Mon, 26 Mar 2018 10:40 PM IST
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गैरसैंण सत्र: काम काज में पास, जनाकांक्षाओं में फेल

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भराड़ीसैंण। विधानसभा के बजट सत्र से भी गैरसैंण को निराशा ही हाथ लगी है। पिछले सत्रों की तुलना में हालांकि इस बार गैरसैंण के भराड़ीसैंण में रिकार्ड दिन काम हुआ और सरकार इस मामले में पास रही, लेकिन जनाकांक्षाओं के अनुुरूप गैरसैंण राजधानी के मामले में सरकार की चुप्पी लोगों को चुभ गई। लोगों का कहना है कि शायद सरकारें गैरसैंण को केवल मुद्दा बनाकर रखना चाहती हैं।
पर्वतीय जिलों के केंद्र बिंदु गैरसैंण के लिए वर्ष 1991 से जनभावना पनपनी शुरू हो गई थी। तब उत्तर प्रदेश की तत्कालीन कल्याण सिंह सरकार ने यहां अपर शिक्षा निदेशालय की स्थापना की थी। वर्र्ष 1992 में यहां उत्तराखंड क्रांति दल ने चंद्रनगर के नाम से राजधानी की मांग रखी, तो वर्ष 1994 में हुए अलग राज्य आंदोलन में लोगों ने गैरसैंण को राजधानी मान लिया था। इसी जनदबाव में वर्ष 1996 में यहां उप्र सरकार ने सचिवालय की घोषणा की थी, लेकिन अलग राज्य बनने के बाद यह मामला ठंडे बस्ते में चला गया। राज्य गठन के बाद यहां तीन नवंबर 2013 को तत्कालीन विजय बहुगुणा सरकार ने पहली कैबिनेट बैठक की। इसके बाद वर्ष 2014 में हरीश रावत सरकार ने 10 और 11 जून को जीआईसी परिसर गैरसैंण में टेंट में विधानसभा सत्र आयोजित किया। वर्ष 2015 में 2 और 3 नवंबर को राजकीय पॉलीटेक्निक गैरसैंण में और 16-17 नवंबर 2016 को भराड़ीसैंण में सत्र का आयोजन किया। त्रिवेंद्र सरकार ने 7 और 8 दिसंबर 17 को भराड़ीसैंण में शीतकालीन सत्र का आयोजन किया, लेकिन इन सभी सत्रों में दो से तीन दिन ही कामकाज हुआ।
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अब भराड़ीसैंण में पहली बार बजट सत्र आयोजित किया गया। 20 से 26 मार्च तक पूरे तक छह दिन सत्र चला। बजट के साथ ही कई महत्वपूर्ण विधयेक सत्र में पास किए गए। सरकार गैरसैंण में अपना कामकाज निपटाने में सफल रही। सदन के बाहर पिछले 111 दिनों से राजधानी के लिए आंदोलन चलता रहा। सत्र शुरू होने पर तमाम संगठनों ने यहां पहुंचकर गैरसैंण को लेकर आवाज बुलंद की लेकिन सदन में सरकार ने राजधानी को लेकर चुप्पी साध ली। राज्य आंदोलनकारी धूमा देवी, पुरुषोत्तम असनोड़ा का कहना है कि सरकार भले ही कामकाज में पास रही हो लेकिन जनाकांक्षाओं के मामले में सरकार फेल रही।
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