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राजशाही की बेगार प्रथा पर लिखी नाट्य पुस्तक पंथ्या का विमोचन
Updated Sat, 09 Dec 2017 10:34 PM IST
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श्रीनगर। राजशाही की बेगार प्रथा के खिलाफ लिखी गई नाट्य पुस्तक का 12 दिसंबर को सुमाड़ी में विमोचन किया जाएगा। रंगकर्मी विमल बहुगुणा के पिता ने समाज के प्रति त्याग और समर्पण की भावना से ओतप्रोत यह पुस्तक को 77 वर्ष पहले लिखी थी।
सुमाड़ी गांव के स्व. शिव प्रसाद बहुगुणा की 77 वर्ष पहले लिखी पुस्तक ‘पंथ्या नाटक’ तथा उनके पुत्र रंगकर्मी विमल बहुगुणा की गढ़वाली जागरण शैली में लिखी रचना ‘जुग-जुग तक रौलू याद सुमाणी कू पंथ्या दादा’ पुस्तकों का विमोचन 12 दिसंबर को होगा। रंगकर्मी बहुगुणा ने बताया कि पुस्तक में राजशाही शासन काल (1676-99) का वर्णन है। जिसमें राजशाही ने सुमाड़ी के ग्रामीणों को बेगार ढोने का फरमान जारी किया था। बताते हैं कि फरमान में बेगार न ढोने की सजा मनुष्य बलि दी। इस पर सुमाड़ी के ग्रामीणों ने फरमान का विरोध किया। विरोध स्वरूप सुमाड़ी के पंथ्या दादा ने सर्वप्रथम स्वेच्छा से प्रज्जवलित अग्नि में अपना बलिदान दिया। उसके बाद पंथ्या की चाची भद्रा व राजकन्या कीर्ति ने भी बेगार प्रथा के विरोध में अपना शरीर अग्नि को समर्पित कर दिया था। बहुगुणा ने बताया कि तब से हर वर्ष सुमाड़ी गांव में यज्ञ व भूत पुजाई का आयोजन व हर दूसरे वर्ष भागवत महा पुराण किया जाता है।
सुमाड़ी गांव के स्व. शिव प्रसाद बहुगुणा की 77 वर्ष पहले लिखी पुस्तक ‘पंथ्या नाटक’ तथा उनके पुत्र रंगकर्मी विमल बहुगुणा की गढ़वाली जागरण शैली में लिखी रचना ‘जुग-जुग तक रौलू याद सुमाणी कू पंथ्या दादा’ पुस्तकों का विमोचन 12 दिसंबर को होगा। रंगकर्मी बहुगुणा ने बताया कि पुस्तक में राजशाही शासन काल (1676-99) का वर्णन है। जिसमें राजशाही ने सुमाड़ी के ग्रामीणों को बेगार ढोने का फरमान जारी किया था। बताते हैं कि फरमान में बेगार न ढोने की सजा मनुष्य बलि दी। इस पर सुमाड़ी के ग्रामीणों ने फरमान का विरोध किया। विरोध स्वरूप सुमाड़ी के पंथ्या दादा ने सर्वप्रथम स्वेच्छा से प्रज्जवलित अग्नि में अपना बलिदान दिया। उसके बाद पंथ्या की चाची भद्रा व राजकन्या कीर्ति ने भी बेगार प्रथा के विरोध में अपना शरीर अग्नि को समर्पित कर दिया था। बहुगुणा ने बताया कि तब से हर वर्ष सुमाड़ी गांव में यज्ञ व भूत पुजाई का आयोजन व हर दूसरे वर्ष भागवत महा पुराण किया जाता है।
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