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बुजुर्ग की पहल, परंपरा से जुड़ी नई पीढ़ी
Updated Mon, 24 Jul 2017 01:50 AM IST
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जागराें के बीच रोपाई की परंपरा दोहराई
-- वर्षों पहले उत्तराखंड में खत्म हो चुकी परंपरा को बुजुर्गों ने की पुनर्जीवित
हेमवती नंदन भट्ट
ऋषिकेश। दशकों पहले पहाड़ में धान की रोपाई की शुरुआत लोक वाद्ययंत्रों की थाप के बीच मांगलिक कार्यों की तरह की जाती थी। इसका सीधा मतलब था कि फसल खराब न हों। आधुनिकता के चलते यह परंपरा लगभग खत्म हो चुकी है। अब यमकेश्वर प्रखंड के बैरागढ़ गांव में 65 वर्षीय बुजुर्ग कुंदन लाल जुगलाण ने फिर से इस परंपरा को पुनर्जीवित करने की पहल की है, जिसे आसपास के वृद्धजनों ने ही न बल्कि युवा पीढ़ी ने भी सराहा है। वर्ष 2014 में यमकेश्वर प्रखंड में आई दैवीय आपदा में अपने खेत खलिहान, गूलें आदि से जुड़े रोजगार को पूरी तरह से खो चुके ब्लॉक की ग्राम सभा सिंदूड़ी के बैरागढ़ के कास्तकारों ने अब फिर से खेती ही नहीं बल्कि अपनी सांस्कृतिक विरासत की ओर भी लौटने की कोशिश की है।
उन्होंने अपने खेतों को न सिर्फ सामूहिक रूप से तैयार करने की पुरानी परंपरा को अपनाया है बल्कि इससे अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़ने का प्रयास भी किया है। स्थानीय ग्रामीणों ने अपने खेतों को तैयार करने के लिए दशकों पहले की परंपरा को फिर से शुरू किया है। किसानों ने पहले आपदा में तबाह हो चुके खेतों से खर-पतवार हटाकर तैयार किया और इसके बाद धान की रोपाई की शुरुआत (सयेल) पारंपरिक लोक वाद्ययंत्रों की थाप व जागर के साथ की। इसमें गांव के बुजुर्ग महिला, पुरुषों के साथ ही युवाओं ने भी पूरे उत्साह के साथ शिरकत की।
पुरानी परंपरा को पुनर्जीवित करने के सूत्रधार बने बुजुर्ग कुंदन लाल ने बताया कि उनकी युवावस्था तक गांव में लोक वाद्ययंत्रों के साथ मांगलिक कार्यों की तर्ज पर धान की रोपाई की शुरुआत होती थी। मगर आधुनिकता के चलते यह परंपरा दशकों पीछे छूट गई। लोक वादक दाताराम व प्रकाशचंद्र का कहना है कि संरक्षण के अभाव में पहाड़ के रीति रिवाज लुप्त हो रहे हैं। उम्मीद है कि बुजुर्गों का यह प्रयास नयी पीढ़ी के लिए प्रेरणादायक होगा।
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-- वर्षों पहले उत्तराखंड में खत्म हो चुकी परंपरा को बुजुर्गों ने की पुनर्जीवित
हेमवती नंदन भट्ट
ऋषिकेश। दशकों पहले पहाड़ में धान की रोपाई की शुरुआत लोक वाद्ययंत्रों की थाप के बीच मांगलिक कार्यों की तरह की जाती थी। इसका सीधा मतलब था कि फसल खराब न हों। आधुनिकता के चलते यह परंपरा लगभग खत्म हो चुकी है। अब यमकेश्वर प्रखंड के बैरागढ़ गांव में 65 वर्षीय बुजुर्ग कुंदन लाल जुगलाण ने फिर से इस परंपरा को पुनर्जीवित करने की पहल की है, जिसे आसपास के वृद्धजनों ने ही न बल्कि युवा पीढ़ी ने भी सराहा है। वर्ष 2014 में यमकेश्वर प्रखंड में आई दैवीय आपदा में अपने खेत खलिहान, गूलें आदि से जुड़े रोजगार को पूरी तरह से खो चुके ब्लॉक की ग्राम सभा सिंदूड़ी के बैरागढ़ के कास्तकारों ने अब फिर से खेती ही नहीं बल्कि अपनी सांस्कृतिक विरासत की ओर भी लौटने की कोशिश की है।
उन्होंने अपने खेतों को न सिर्फ सामूहिक रूप से तैयार करने की पुरानी परंपरा को अपनाया है बल्कि इससे अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़ने का प्रयास भी किया है। स्थानीय ग्रामीणों ने अपने खेतों को तैयार करने के लिए दशकों पहले की परंपरा को फिर से शुरू किया है। किसानों ने पहले आपदा में तबाह हो चुके खेतों से खर-पतवार हटाकर तैयार किया और इसके बाद धान की रोपाई की शुरुआत (सयेल) पारंपरिक लोक वाद्ययंत्रों की थाप व जागर के साथ की। इसमें गांव के बुजुर्ग महिला, पुरुषों के साथ ही युवाओं ने भी पूरे उत्साह के साथ शिरकत की।
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पुरानी परंपरा को पुनर्जीवित करने के सूत्रधार बने बुजुर्ग कुंदन लाल ने बताया कि उनकी युवावस्था तक गांव में लोक वाद्ययंत्रों के साथ मांगलिक कार्यों की तर्ज पर धान की रोपाई की शुरुआत होती थी। मगर आधुनिकता के चलते यह परंपरा दशकों पीछे छूट गई। लोक वादक दाताराम व प्रकाशचंद्र का कहना है कि संरक्षण के अभाव में पहाड़ के रीति रिवाज लुप्त हो रहे हैं। उम्मीद है कि बुजुर्गों का यह प्रयास नयी पीढ़ी के लिए प्रेरणादायक होगा।
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